क्या आप एक सामजिक आदमी और धार्मिक आदमी में फर्क महसूस करते है!मतलब धर्म और समाज कितने जुड़ा है एक-दुसरे से!क्या एक सामजिक आदमी धार्मिक हो सकता है या एक धार्मिक आदमी सामाजिक नहीं हो सकता!कई बार जो बाते समाज के हिसाब से हितकर होती है धर्म उसे मान्यता नहीं देता!कई बार समाज ही धर्म की बातो के खिलाफ दिखाई देता है!हालांकि मै अभी "धर्म" को ही नहीं समझ पाया हूँ अभी,शायद तभी ऐसा कहने की गलती कर रह हूँ!और अज्ञानी कहाँ नहीं हो सकते!किन्ही विषयों में कोई अज्ञानी है,किन्ही में कोई!
मै यदि कुछ बोल रहा हूँ तो वो मेरी जिम्मेवारी है कि मै सिर्फ वो ही बोलू जो मेरी जानकारी,अनुभव और बुद्धि से मेल खा रहा हो!इसमें यदि मेरी बुद्धि किसी और के हितो के बारे में भी उतनी ही सजग है जितनी कि मेरे खुद के हितो के बारे में तो शायद मै जो बोलूँगा वो सभी को अच्छा भी लगेगा और सभी के लिए हितकर भी होगा,अब चाहे मेरी जानाकरी और अनुभव मुझे कुछ भी कह रहे हो!
हर कोई ये तालमेल सदैव बना के रखे,क्या ये सभी के लिए सम्भव है!कभी-कभी बुद्धि भी विचलित हो जाती है,कभी जानकारी और कभी अनुभव के चक्करों में पड़ जाती है!कई बार हम वो नहीं बोल पाते जो हम वास्तव में कहना चाहते है,बल्की वो ही बोल जाते है जो दूसरा हम से कहलवाना चाह रहा है!
अब इतनी जिम्मेवारी तो हमारी बनती ही है कि हम सजग रहे!
ये बाते अमित भाई की पोस्ट पर दी गयी टिपण्णी है!कुछ अच्छा पढेंगे तो अच्छा लिखने की भी प्रेरणा मिलती ही है!क्यों जी......
जय हिंद जय श्रीराम,
कुंवर जी,
शुक्रवार, 23 अप्रैल 2010
गुरुवार, 22 अप्रैल 2010
मुस्लिम समाज को कलंकित करने वालो के लिए "एजाज़ भाई" ने पेश की सरहानीय मिसाल!और हाँ!इसे वो भी पढ़े जो ये कहते है की मुस्लिम समाज सिर्फ कट्टर लोगो का समाज है,इसमें सुधार की गुंजाईश नहीं है!(एक विचार....!)
कल मेरी पोस्ट पर जो सबसे पहले टिप्पणी आई,वो चौंकाने वाली थी!टिप्पणीकार थे श्रीमान एजाज इद्रेसी!
ये वो ही एजाज भाई जान थे जो कुछ दिन पहले कह रहे थे कि "क्या आप के घर में सभी वेद,पुराण और धार्मिक ग्रन्थ है,या आप अभी खरीदने वाले हो!:"
इसी पोस्ट कि एक टिप्पणी में उन्होंने कहा था कि,"ये तो शुरुआत है,आगे-आगे देखिये होता है क्या?"
और ये सब आगे चल कर वो सिद्ध भी करते दिखाई दिए!ब्लोग्वानी ने इसी कट्टरता को देखते हुए इनकी पोस्ट भी ब्लोग्वानी से हटा दी थी!
लेकिन ये कलम के सच्चे सिपाही थे!हार नहीं मानी और लगातार लिखते रहे!लेकिन कब तक ये सच्चाई से भागते!अल्लाह का लाख-लाख शुक्र है कि जल्द ही इनको गलत राह से सही राह पर पहुंचा दिया!
आदमी गलती करता है,और भूल जाता है!लेकिन एक समझदार आदमी गलतियों से भी सीख लेता हुआ चलता है!गलतिया हो जाती है पर उनको सुधारा भी जा सकता है इसी की मिसाल एजाज़ भाई ने पेश की है! वो मिसाल देखने के लिए यहाँ क्लिक करे.... !
यहाँ उन्होंने स्वीकार है कि वो सब उन्होंने किसी के बहकावे में आकर किया था!मै ज्यादा नहीं लिखूंगा आप स्वयं ही दिए गए लिन्क पर जाकर देखे तो बेहतर रहेगा!
गलती मानने का सहास कोई छोटी बात नहीं!यहाँ तो ऐसे-ऐसे भी है जो एक बात को पकड़ कर ही ब्लॉग्गिंग कर रहे है!कुछ का ये हाल है कि चोरी तो छूट गयी है,पर हेरा-फेरी......?
आज जब एजाज़ भाई ने ये सहासिक कदम उठाया है तो क्यों ना सारा ब्लॉग-जगत उनके साथ खड़ा हो जाए!दिखा देना चाहिए उन अभिमानियो को कि अच्छे कदमो का हर जगह स्वागत होता है!शायद उन पर कुछ फर्क पड़े!हर किसी को इस से प्रेरणा लेनी चाहिए!
जय हिंद,जय श्री राम!
कुंवर जी,
ये वो ही एजाज भाई जान थे जो कुछ दिन पहले कह रहे थे कि "क्या आप के घर में सभी वेद,पुराण और धार्मिक ग्रन्थ है,या आप अभी खरीदने वाले हो!:"
इसी पोस्ट कि एक टिप्पणी में उन्होंने कहा था कि,"ये तो शुरुआत है,आगे-आगे देखिये होता है क्या?"
और ये सब आगे चल कर वो सिद्ध भी करते दिखाई दिए!ब्लोग्वानी ने इसी कट्टरता को देखते हुए इनकी पोस्ट भी ब्लोग्वानी से हटा दी थी!
लेकिन ये कलम के सच्चे सिपाही थे!हार नहीं मानी और लगातार लिखते रहे!लेकिन कब तक ये सच्चाई से भागते!अल्लाह का लाख-लाख शुक्र है कि जल्द ही इनको गलत राह से सही राह पर पहुंचा दिया!
आदमी गलती करता है,और भूल जाता है!लेकिन एक समझदार आदमी गलतियों से भी सीख लेता हुआ चलता है!गलतिया हो जाती है पर उनको सुधारा भी जा सकता है इसी की मिसाल एजाज़ भाई ने पेश की है! वो मिसाल देखने के लिए यहाँ क्लिक करे.... !
यहाँ उन्होंने स्वीकार है कि वो सब उन्होंने किसी के बहकावे में आकर किया था!मै ज्यादा नहीं लिखूंगा आप स्वयं ही दिए गए लिन्क पर जाकर देखे तो बेहतर रहेगा!
गलती मानने का सहास कोई छोटी बात नहीं!यहाँ तो ऐसे-ऐसे भी है जो एक बात को पकड़ कर ही ब्लॉग्गिंग कर रहे है!कुछ का ये हाल है कि चोरी तो छूट गयी है,पर हेरा-फेरी......?
आज जब एजाज़ भाई ने ये सहासिक कदम उठाया है तो क्यों ना सारा ब्लॉग-जगत उनके साथ खड़ा हो जाए!दिखा देना चाहिए उन अभिमानियो को कि अच्छे कदमो का हर जगह स्वागत होता है!शायद उन पर कुछ फर्क पड़े!हर किसी को इस से प्रेरणा लेनी चाहिए!
जय हिंद,जय श्री राम!
कुंवर जी,
बुधवार, 21 अप्रैल 2010
देखना एक बार क्या ये सच्ची बात है?(वयंग्य),
देखना एक बार ये आँखों की चमक
ये हाथो की पकड़
ये होंठो पर मुस्कान
क्या सच्ची बात है!
या फिर
महज़ औपचारिकताओं की
करामात है!
ये फोटो अभी कुछ दिन पहले दैनिक जागरण में छपा था!देख कर कुछ अटपटा सा तो लगा,पर सोचा काश ये सब सच्चा होता!आप क्या सोचते है इस बारे में.....?
ये हाथो की पकड़
ये होंठो पर मुस्कान
क्या सच्ची बात है!
या फिर
महज़ औपचारिकताओं की
करामात है!
ये फोटो अभी कुछ दिन पहले दैनिक जागरण में छपा था!देख कर कुछ अटपटा सा तो लगा,पर सोचा काश ये सब सच्चा होता!आप क्या सोचते है इस बारे में.....?
मंगलवार, 20 अप्रैल 2010
एक रेल 150 की.मी./घंटा की रफ़्तार से आ रही है, और दूसरी 123 की.मी../घंटा की रफ़्तार से जा रही है,तो बताओ मेरी उम्र कितनी?"(हास्य-वयंग्य)
बहुत पुरानी तो बात नहीं है खैर!फिर भी पुरानी तो है ही,काफी समय से सुनते आ रहे है!
हमारे विद्यालय की दीवारे भी तब ज्यादा ऊँची नहीं होती थी!ये तो अब करनी पड़ी जब विद्यालयों की लड़कियों को देखने वालो को आंखो से ही डराना पर्याप्त ना रहा!
हाँ तो तब जब दीवारें ऊँची नहीं थी!बहार से अन्दर साफ़ दिखाई दे जाता था!एक ताऊ बहार खेतो में गाय-भैंस चरा रहा था!वो क्या देखता है के एक अध्यापक महोदय कक्षा के सभी बच्चो की एक-एक कर के पिटाई करता जा रहा था!जब बहुत देर हो गयी और सीन ना बदला तो ताऊ जी रहा ना गया!वो दीवार फांद कर अन्दर!सीधे कक्षा में!पूछने पर पता चला के मास्टर जी ने जो सवाल पूछा उसका जवाब नहीं था किसी के पास!ताऊ जी ने कहा-"मास्टर जी वो सवाल सा एक बार मुझ से भी पूछ लो!क्या पता मै जवाब दे दूं!
मास्टर जी बोले "जब हाई क्लास के बच्चे इस सवाल को हल नहीं कर पाए तो आप क्या हल करेंगे!"
ताऊ जी ने थोड़ी सी अपनी टोन पकड़ते हुए कहा-"टेम क्यूँ खराब करो हो?"
मास्टर जी समझ गये!बोले-"सवाल ये है,एक रेल 150 की.मी./घंटा की रफ़्तार से आ रही है, और दूसरी 123 की.मी../घंटा की रफ़्तार से जा रही है,तो बताओ मेरी उम्र कितनी?"
ताऊ जी ने बहुत गहन विचार के बाद जवाब दिया, "मास्टर जी आपकी उम्र है 42 साल!
मास्टर जी हैरान,परेशान!बोले."ताऊ जी आपका गणित लाजवाब है!आपने किस फार्मूले से सही जवाब निकाला है?"
ताऊ जी-"फार्मुल-वार्मुला तो कुछ नहीं!बस एक बात का विचार किया के हमारे छोटे लड़के की उम्र 21 साल है और वो आधा पागल है!और मुझे आप पूरे पागल लगे!बस ये बात थी!अब आप मास्टर हो,और तो कुछ नहीं कहा जा सकता जी!
अब मै सोच रहा हूँ कि आज-कल ब्लॉग जगत में जो लोग उलटे सीधे सवाल पूछने में ही अपनी उर्जा खपा रहे है वो 21 साल के है या 42 के!मेरे जैसे मुर्ख,कम उम्र,कम अक्ल ये काम करे तो शोभा भी दे,पर यहाँ तो कई डॉक्टर भी है!ऐसा लगता है जैसे अभी सारी समस्याओं को निपटा देंगे,सवाल खड़ा कर के ही बस!कुछ तो विचार करना चाहिए!
जय हिंद,जय श्रीराम,
कुंवर जी,
हमारे विद्यालय की दीवारे भी तब ज्यादा ऊँची नहीं होती थी!ये तो अब करनी पड़ी जब विद्यालयों की लड़कियों को देखने वालो को आंखो से ही डराना पर्याप्त ना रहा!
हाँ तो तब जब दीवारें ऊँची नहीं थी!बहार से अन्दर साफ़ दिखाई दे जाता था!एक ताऊ बहार खेतो में गाय-भैंस चरा रहा था!वो क्या देखता है के एक अध्यापक महोदय कक्षा के सभी बच्चो की एक-एक कर के पिटाई करता जा रहा था!जब बहुत देर हो गयी और सीन ना बदला तो ताऊ जी रहा ना गया!वो दीवार फांद कर अन्दर!सीधे कक्षा में!पूछने पर पता चला के मास्टर जी ने जो सवाल पूछा उसका जवाब नहीं था किसी के पास!ताऊ जी ने कहा-"मास्टर जी वो सवाल सा एक बार मुझ से भी पूछ लो!क्या पता मै जवाब दे दूं!
मास्टर जी बोले "जब हाई क्लास के बच्चे इस सवाल को हल नहीं कर पाए तो आप क्या हल करेंगे!"
ताऊ जी ने थोड़ी सी अपनी टोन पकड़ते हुए कहा-"टेम क्यूँ खराब करो हो?"
मास्टर जी समझ गये!बोले-"सवाल ये है,एक रेल 150 की.मी./घंटा की रफ़्तार से आ रही है, और दूसरी 123 की.मी../घंटा की रफ़्तार से जा रही है,तो बताओ मेरी उम्र कितनी?"
ताऊ जी ने बहुत गहन विचार के बाद जवाब दिया, "मास्टर जी आपकी उम्र है 42 साल!
मास्टर जी हैरान,परेशान!बोले."ताऊ जी आपका गणित लाजवाब है!आपने किस फार्मूले से सही जवाब निकाला है?"
ताऊ जी-"फार्मुल-वार्मुला तो कुछ नहीं!बस एक बात का विचार किया के हमारे छोटे लड़के की उम्र 21 साल है और वो आधा पागल है!और मुझे आप पूरे पागल लगे!बस ये बात थी!अब आप मास्टर हो,और तो कुछ नहीं कहा जा सकता जी!
अब मै सोच रहा हूँ कि आज-कल ब्लॉग जगत में जो लोग उलटे सीधे सवाल पूछने में ही अपनी उर्जा खपा रहे है वो 21 साल के है या 42 के!मेरे जैसे मुर्ख,कम उम्र,कम अक्ल ये काम करे तो शोभा भी दे,पर यहाँ तो कई डॉक्टर भी है!ऐसा लगता है जैसे अभी सारी समस्याओं को निपटा देंगे,सवाल खड़ा कर के ही बस!कुछ तो विचार करना चाहिए!
जय हिंद,जय श्रीराम,
कुंवर जी,
सोमवार, 19 अप्रैल 2010
कभी-कभी मै मजबूर हो जाता हूँ सोचने को कि,ऐसा भी हो सकता है क्या?(कविता),
मानवीय संवेदनाये कब-कहाँ क्या रूप धर ले इसे समझना अभी तक काफी मुश्किल रहा है,मेरे लिए तो कम से कम!नहीं मालूम खुद का भी तो औरो को तो क्या ख़ाक जान पाऊंगा मै!फिर भी शब्दों के सहारे कभी खुद को कभी किसी और को समझाने निकल पड़ता हूँ जी!या यूँ कहे कि शब्द खुद ही निकल पड़ते है,तो ज्यादा ठीक रहेगा!आज आपके समक्ष प्रस्तुत है शब्दों का ऐसा ही अनजान सा सफ़र.......
कभी-कभी मै मजबूर हो जाता हूँ सोचने को कि,
ऐसा भी हो सकता है क्या?
.सूरज को दर्पण दिखाऊं ऐसी मेरी औकात नहीं,
घडी भर को नभ पे जो छा जाए बादल,हो जाती रात नहीं,
सुख-दुख जो मिलते है कैसे कहूं ये सब उस ही की सौगात नहीं,
निशा बीते और हो प्रभात नहीं,
ऐसा भी हो सकता है क्या?
मन ही तो है,मनमानी कर गया तो भला क्यों विलाप हुआ,
किसी के लिए मुक्ति तो किसी के लिए अभिशाप हुआ,
संवेदना इतनी भी क्यों जगाई प्रभु,जो सुख में भी संताप हुआ,
बिना तेरी मर्जी के मुझ से ये पाप हुआ,
ऐसा भी हो सकता है क्या?
अतीत को वर्तमान पे लाद पता नहीं क्या पाऊंगा?
अतीत का बोझ यूँ ही क्या मै ताउम्र उठाऊंगा?
ना चाहते हुए भी थक जो गया तो कहाँ जाऊँगा?
मै कुछ भी नहीं कर पाऊंगा,
ऐसा भी हो सकता है क्या?
खूब जिया है ऐसे पलो को हमने भी क्या बताना पड़ेगा,
जिन पलो में मृत थे हम वो वक़्त क्या फिर दोहराना पड़ेगा,
विशवास दिलाने की खातिर क्या घाव भी दिखाना पड़ेगा,
मुझे उसे फिर से बुलाना पड़ेगा?
ऐसा भी हो सकता है क्या?
कभी-कभी मै मजबूर हो जाता हूँ सोचने को कि,
ऐसा भी हो सकता है क्या?
.सूरज को दर्पण दिखाऊं ऐसी मेरी औकात नहीं,
घडी भर को नभ पे जो छा जाए बादल,हो जाती रात नहीं,
सुख-दुख जो मिलते है कैसे कहूं ये सब उस ही की सौगात नहीं,
निशा बीते और हो प्रभात नहीं,
ऐसा भी हो सकता है क्या?
मन ही तो है,मनमानी कर गया तो भला क्यों विलाप हुआ,
किसी के लिए मुक्ति तो किसी के लिए अभिशाप हुआ,
संवेदना इतनी भी क्यों जगाई प्रभु,जो सुख में भी संताप हुआ,
बिना तेरी मर्जी के मुझ से ये पाप हुआ,
ऐसा भी हो सकता है क्या?
अतीत को वर्तमान पे लाद पता नहीं क्या पाऊंगा?
अतीत का बोझ यूँ ही क्या मै ताउम्र उठाऊंगा?
ना चाहते हुए भी थक जो गया तो कहाँ जाऊँगा?
मै कुछ भी नहीं कर पाऊंगा,
ऐसा भी हो सकता है क्या?
खूब जिया है ऐसे पलो को हमने भी क्या बताना पड़ेगा,
जिन पलो में मृत थे हम वो वक़्त क्या फिर दोहराना पड़ेगा,
विशवास दिलाने की खातिर क्या घाव भी दिखाना पड़ेगा,
मुझे उसे फिर से बुलाना पड़ेगा?
ऐसा भी हो सकता है क्या?
जय हिंद, जय श्री राम
कुंवर जी,
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