भावनाओ के बंजर में भी
फूल खिलते है
एक सहरा
तो अपना
बना के देखो!
पंक्तियों की कोंपले
भी फूटेंगी
कुछ शब्द तो
रेत में
बिखरा के देखो!
फूल खिलते है
एक सहरा
तो अपना
बना के देखो!
पंक्तियों की कोंपले
भी फूटेंगी
कुछ शब्द तो
रेत में
बिखरा के देखो!
कविताओ की फसल
भी लहलहाएगी खूब
संवेदनाओं से
उन्हें
सींच कर तो देखो!
जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुँवर जी,