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शनिवार, 21 अप्रैल 2012

भावनाओ के बंजर में भी फूल खिलते है....(कुँवर जी)

भावनाओ के बंजर में भी
फूल खिलते है
एक सहरा
तो अपना
बना के देखो! 
पंक्तियों की कोंपले
भी फूटेंगी
कुछ शब्द तो 
रेत  में
बिखरा के देखो!
कविताओ की फसल
भी लहलहाएगी खूब
संवेदनाओं से
उन्हें
सींच कर तो देखो!


जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुँवर जी,





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