शुक्रवार, 16 अप्रैल 2010

कृप्या सच्चे मुसलमान भाई इसे ना पढ़े! मै नहीं चाहता मेरी वजह से किसी मुस्लिम भाई के इस्लाम का उल्लंघन हो!लेकिन जवाब कौन देगा भाई?

मेरा इरादा कभी भी किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाने का कतई नहीं रहा है!बस विषय कई बार ऐसे होते है कि कई बार बहस चल ही पड़ती है!हो  सकता  है  कि मै गलत हूँ,तो सही बताने वालो का भी स्वागत है जी!


 "मुफ्ती अब्दुल कुदूस रूमी ने फतवा जारी करते हुए कहा कि राष्ट्रगान का गायन उन्हें मुस्लिमों को नरक पहुँचाएगा। बहिष्त लोगों में लोहा मण्डी और शहीद नगर मस्जिदों के मुतवल्ली भी थे। इनमें से 13 ने माफी मांग ली। आश्चर्य की बात है कि अपराधिक गतिविधियों में शामिल होना, आतंकवादी कार्रवाईयों में भाग लेना, झूठ, धोखा, हिंसा, हत्या, असहिष्णुता, शराब, जुआ, राष्ट्र द्रोह और तस्करी जैसे कृत्य से कोई नरक में नहीं जाता मगर देश भक्ति का ज़ज़बा पैदा करने वाले राष्ट्र गान को गाने मात्र से एक इंसान नरक का अधिकारी हो जाता है।"
इसीलिए मै सच्चे मुसलमान भाइयो से पहले ही अपील कर चुका हूँ!
                           
वन्दे मातरम्‌ गीत आनन्दमठ में 1882 में आया लेकिन उसको एक एकीकृत करने वाले गीत के रूप में देखने से सबसे पहले इंकार 1923 में काकीनाड कांग्रेस अधिवेशन में तत्कालीन कांग्रेसाध्यक्ष मौलाना अहमद अली ने किया जब उन्होंने हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के हिमालय पं. विष्णु दिगम्बर पलुस्कर को वन्दे मातरम्‌ गाने के बीच में टोका। लेकिन पं. पलुस्कर ने बीच में रुकर कर इस महान गीत का अपमान नहीं होने दिया, पं- पलुस्कर पूरा गाना गाकर ही रुके।


उस हिसाब से  तो ब्रिटेन के राष्ट्र गान में रानी को हर तरह से बचाने की प्रार्थना भगवान से की गई है अब ब्रिटेन के नागरिकों को यह सवाल उठाना चाहिए कि कि भगवान रानी को ही क्यो बचाए, किसी कैंसर के मरीज को क्यों नहीं?
बांग्लादेश से पूछा जा सकता है कि उसके राष्ट्रगीत में यह आम जैसे फल का विशेषोल्लेख क्यों है?
सउदी अरब का राष्ट्रगीत ‘‘सारे मुस्लिमों के उत्कर्ष की ही क्यों बात करता है और राष्ट्रगीत में राजा की चाटुकारिता की क्या जरूरत है?सीरिया के राष्ट्रगीत में सिर्फ ‘अरबवाद की चर्चा क्या इसे रेसिस्ट नह बनाती? ईरान के राष्ट्रगीत में यह इमाम का संदेश क्या कर रहा है? लीबिया का राष्ट्रगीत अल्लाहो अकबर की पुकारें लगाता है तो क्या वो धार्मिक हुआ या राष्ट्रीय?


शम्सु इस्लाम हमें यह भी जताने की कोशिश करते हैं कि वन्दे मातरम्‌ गीत कोई बड़ा सिद्ध नहीं था और यह भी कोई राष्ट्रगीत न होकर मात्र बंगाल गीत था। वह यह नहीं बताते कि कनाडा का राष्ट्रगीत 1880 में पहली बार बजने के सौ साल बाद राष्ट्रगीत बना। 1906 तक उसका कहीं उल्लेख भी नहीं हुआ था। आस्ट्रेलिया का राष्ट्रगीत 1878 में सिडनी में पहली बार बजा और 19 अप्रैल 1984 को राष्ट्रगीत का दर्जा प्राप्त हुआ।


सवाल यह है कि इतने वषो तक क्यों वन्दे मातरम्‌ गैर इस्लामी नहीं था?


क्यों खिलाफत आंदोलन के अधिवेशनों की शुरुआत वन्दे मातरम्‌ से होती थी और ये अहमद अली, शौकत अली, जफर अली जैसे वरिष्ठ मुस्लिम नेता इसके सम्मान में उठकर खड़े होते थे। बेरिस्टर जिन्ना पहले तो इसके सम्मान में खडे न होने वालों को फटकार लगाते थे। रफीक जकारिया ने अपने निबन्ध में इस बात की ओर इशारा किया है। उनके अनुसार मुस्लिमों द्वारा वन्दे मातरम्‌ के गायन पर विवाद निरर्थक है। यह गीत स्वतंत्रता संग्राम के दौरान काँग्रेस के सभी मुस्लिम नेताओं द्वारा गाया जाता था। जो मुस्लिम इसे गाना नहीं चाहते, न गाए लेकिन गीत के सम्मान में उठकर तो खड़े हो जाए क्योंकि इसका एक संघर्ष का इतिहास रहा है और यह संविधान में राष्ट्रगान घोषित किया गया है।


1906 से 1911 तक यह वंदे मातरम्‌ गीत पूरा गाया जाता था तो इस मंत्र में यह ताकत थी कि बंगाल का विभाजन ब्रितानी हुकूमत को वापस लेना पडा, लेकिन, 1947 तक जबकि इस मंत्र गीत को खण्डित करने पर तथाकथित ‘राजनीतिक सहमति बन गई तब तक भारत भी इतना कमजोर हो गया कि अपना खण्डन नहीं रोक सका यदि इस गीत मंत्र के टुकड़े पहले हुए तो उसकी परिणति देश के टुकडे होने में हुई।मदनलाल ढींगरा, फुल्ल चाकी, खुदीराम बोस, सूर्यसेन, रामप्रसाद बिस्मिल और अन्य बहुत से क्रांतिकारियों ने वंदे मातरम कही कर फासी के फंदे को चूमा। भगत सिंह अपने पिता को पत्र वंदे मातरम्‌ से अभिवादन कर लिखते थे। सुभाषचं बोस की आजाद हिन्द फौज ने इस गीत को अंगीकार किया और सिंगापुर रेडियो स्टेशन से इसका प्रसारण होता था।


ये है जी वो हमारा सर्व-सम्माननीय राष्ट्रगीत!


सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम्

सस्य श्यामलां मातरंम् .
शुभ्र ज्योत्सनाम् पुलकित यामिनीम्
फुल्ल कुसुमित द्रुमदलशोभिनीम्,
सुहासिनीं सुमधुर भाषिणीम् .
सुखदां वरदां मातरम् ॥

कोटि कोटि कन्ठ कलकल निनाद कराले
द्विसप्त कोटि भुजैर्ध्रत खरकरवाले
के बोले मा तुमी अबले
बहुबल धारिणीम् नमामि तारिणीम्
रिपुदलवारिणीम् मातरम् ॥



तुमि विद्या तुमि धर्म, तुमि ह्रदि तुमि मर्म
त्वं हि प्राणाः शरीरे
बाहुते तुमि मा शक्ति,
हृदये तुमि मा भक्ति,
तोमारै प्रतिमा गडि मन्दिरे-मन्दिरे ॥


त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी
कमला कमलदल विहारिणी
वाणी विद्यादायिनी, नमामि त्वाम्
नमामि कमलां अमलां अतुलाम्
सुजलां सुफलां मातरम् ॥


श्यामलां सरलां सुस्मितां भूषिताम्
धरणीं भरणीं मातरम् ॥


आज कि सारी सामग्री मैंने "वन्देमातरम इतिहास विकिपीडिआ" से ली है!मै इसके लिए 
"वन्देमातरम इतिहास विकिपीडिआ" का आभारी हूँ!u -tube पर सुनने-देखने के लिए नीचे दिए गए लिन्क पर क्लिक कर के कुछ महसूस करे! चित्र भी गूगल से ही लिया है!


http://www.youtube.com/watch?v=xj1Iy4nRMkc




"इस देश में असंख्य अल्पसंख्यक वन्दे मातरम्‌ के प्रति श्रद्धा रखते हैं। यह उनकी श्रद्धा का अपमान ही था जब आगरा में 10 मार्च 2004 को 54 मुसलमानों को जाति बाहर कर दिया गया और उनकी शादिया शून्य घोषित कर दी गई क्योंकि उन्होंने  कहीं ये कह दिया था कि वन्दे मातरम्‌ गाना गैर इस्लामी नहीं है।"


सवाल यह है कि इतने वषो तक क्यों वन्दे मातरम्‌ गैर इस्लामी नहीं था?



क्यों खिलाफत आंदोलन के अधिवेशनों की शुरुआत वन्दे मातरम्‌ से होती थी और ये अहमद अली, शौकत अली, जफर अली जैसे वरिष्ठ मुस्लिम नेता इसके सम्मान में उठकर खड़े होते थे। बेरिस्टर जिन्ना पहले तो इसके सम्मान में खडे न होने वालों को फटकार लगाते थे।




कृप्या सच्चे मुसलमान भाई इसे ना पढ़े! मै नहीं चाहता मेरी वजह से किसी मुस्लिम भाई के इस्लाम का उल्लंघन हो!लेकिन जवाब कौन देगा भाई?











जय हिंद जय श्रीराम,
कुंवर जी,

गुरुवार, 15 अप्रैल 2010

पंडित जसराज जी को एक अनोखा उपहार!

पंडित जसराज जी का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है!ऐसे कलाकार को कल हरियाणा सरकार ने एक अलग तरह का तोहफा दिया!विस्तृत खबर के लिए नीचे दिए गए लिन्क पर क्लिक करे!
yaha...

आज सुबह-सुबह ये पढ़ कर बहुत अच्छा लगा!किसी प्रतिभा का सम्मान करना हमारी पुरानी परम्परा रही है!लेकिन उनके पुश्तैनी घर,गाँव,नगर को हम अमूमन नजरअंदाज ही करते रहे है!एक अनजान सी,अनावश्यक सी परम्परा ये भी चली ही आ रही है!

ऐसा तो पहले भी बहुत हुआ है कि मुख्यमंत्रियों,सांसदों ने अपने गाँव के लिए बहुत से विकास कार्य करवाए या किये!लेकिन एक प्रतिभा का सम्मान उसके गाँव को देकर एक अच्छा उदाहरण दिया श्री हुड्डा जी ने!ऐसे कितने ही कलाकार और खिलाड़ी है जिनका गाँव आज भी गुमंनामी के अंधेरो में ही पड़ा हुआ है!

ऐसे सरकारी कदमो से कलाकारों में हौसला तो बढ़ता ही है साथ ही उनके घर-गाँव वालो में उन्हें सहयोग देने की भावना भी तो बढती है!ये एक जरुरी और प्रशंशनीय शुरुआत मै कहूं तो गलत ना होगा!


जय हिंद,जय श्री राम, 
कुंवर जी, 

बुधवार, 14 अप्रैल 2010

ये गर्व भरा, मस्तक मेरा....!

कितने ही भजन हमारे दिल को छू जाते है!कुछ तो शत-प्रतिशत हमारे दिल कि बात कहते से प्रतीत होते है!ऐसे ही कुछ एक भजनों में से एक आज आप के लिए लाया हूँ!मुझे नहीं पता था कि  किसकी रचना है,किसने संगीत दिया है और किसने गाया है!लेकिन सभी कुछ चरम पर है अपने,लेखन,गायन और संगीत!सभी कुछ!शब्दों की गहराई को महसूस करें.... 



ये  गर्व  भरा, मस्तक  मेरा
प्रभु  चरण धुल तक झुकने  दे,
अहंकार  विकार भरे  मन  को
निज  नाम  की माला, जपने  दे
ये  गर्व  भरा....


मै  मन  के  मैल  को धो  न  सका
ये  जीवन तेरा हो  न सका!-2
हाँ !हो  न  सका,
मै  प्रेमी  हूँ,इतना  ना  झुका!
गिर भी  जो  पडूँ  तो, उठने  दे!
ये  गर्व  भरा....


मैं ज्ञान की बातों ने खोया,
और कर्म-हीन पड़कर सोया!-2
जब आंख खुली तो मन रोया;
जग सोये मुझको जगने  दे!
ये  गर्व  भरा....




जैसा हूँ मै खोटा  या  खरा,
निर्दोष  शरण  में आ  तो  गया!-2
हाँ, आ  तो  गया!
इक   बार  ये कहदे  खाली  जा,
या प्रीत की रीत छलकने  दे!
ये  गर्व  भरा....

गूगल पर ढूँढा तो नीचे दिया गया लिन्क मिला इस भजन को सुनाने के लिए...!चित्र भी गूगल से ही उठाया है!
सुने आराम से!

http://www.youtube.com/watch?v=JNgJiFWy3xA

जय हिंद,जय श्री राम!

कुंवर जी,

मंगलवार, 13 अप्रैल 2010

अरे हिन्दू होगा!(वयंग्य),

राम राम जी,,,
मेरी पिछली कविता ने मेरे मन में कई प्रशन खड़े कर दिए!एक तो यही कि आखिर ये हिन्दू कौन है भई? 

ये हिन्दू कौन है भई?
पहले  जो वयांख्या थी,पहले थी!
अब तो जो बेचारा सा लगे,
भाइयो में भी न्यारा से लगे,
एक समर्थ मजबूर जो है,
वही हिन्दू है!


आज जो स्थिति बनती जा रही है हिन्दू की,उस पर बहुत दुखी होकर ये पंक्तियाँ  लिखी जा रही है!
हर कोई हिन्दू "शब्द" को भी और "हिन्दू"
को भी अपने मतलब के हिसाब से प्रयोग कर रहा है!इसके लिए जिम्मेवारी कौन ले!

हद की बात तो ये है कि हर कोई चाहता है कि भगत सिंह पैदा हो,पर हमारे घर में नहीं,पड़ोसी के घर में!नीचे जो लिखा गया है वो थोडा और स्पष्ट करेगा कि हिन्दू कौन है!


जो मर्जी उसे कुछ भी कह जाता था
वैसे घर उसी का था मगर,
हर कोई उसे धमका जाता था!
'तुझे बोलने का हक़ नहीं'
कह कर हर कोई उसे दबाता था!
डरपोक तो वो  था
पर निर्लज्ज नहीं बेचारा,
जब ही तो
आंसुओ को अपने छुपाता था!
जो  भी  सुनता कहता...
अरे हिन्दू होगा!


वो गरीब है,लाचार है,
थोडा मानसिक बीमार है,
मज़बूरी दिखता फिरता है
अब ये ही उसका व्यवहार है,
अपनी कायरता पर रो-रो कर
साहनुभूति लेना 
उसका जन्मसिद्ध अधिकार है!
कोई सुनता है तो कहता है...
अरे हिन्दू होगा!


जय हिंद,जय श्री राम,
कुंवर जी,









शुक्रवार, 9 अप्रैल 2010

ओ हिन्दू जाग!क्योंकि सभी को जगाना है!...(कविता),

ओ हिन्दू जाग!क्योंकि सभी को जगाना है!
पहले खुद को जान जो सबको बतलाना है!


शिराओ में बहता  खून जैसे पानी हो गया है,
रबड़ और नालियों में बहने का नाम ही जवानी हो गया है,
हुंकार भरने का विचार अब आसमानी हो गया है,
मन की मानना ही बस अब मनमानी हो गया है!
पुराना इतिहास तो कहानी हो गया है,अब नया बनाना है!




जमीर मर गया है या सो रहा है ये सोचना पड़ेगा,
क्या करना है और क्या हो रहा है सोचना पड़ेगा,
सही भी है या नहीं जो हो रहा है सोचना पड़ेगा,
क्या पाने के लिए क्या खो रहा है सोचना पड़ेगा!
कैसे जीना है सोचना पड़ेगा,नहीं तो मर जाना है!


कल नहीं सोचा था तो आज मजबूर है हम,
जो चल पड़े तो भला मंजिल से कब दूर है हम,
पुष्प कि ज्यूँ  कोमल तो यम की तरह क्रूर है हम,
मृत्य के सम्मुख भी सीना तान ले जो वो ही शूर है हम!
खाली दंभ में नहीं चूर है हम,ये भी तो दिखाना है!
















जय हिन्द,जय  श्री राम!



कुंवर जी,

लिखिए अपनी भाषा में