ओस की बूंदे जम गयी थी पलकों पर,
अब झपकते तो मोती झर नहीं जाते,
साँसों में भर ली थी सुगंध जीवन की.
अब उन्हें छोड़ते तो मर नहीं जाते,
सपनो में बदल गयी थी जिंदगी,
जागते तो सपने बिखर नहीं जाते,
कुँवर जी,
जय हिंद,जय श्रीराम!
अब झपकते तो मोती झर नहीं जाते,
साँसों में भर ली थी सुगंध जीवन की.
अब उन्हें छोड़ते तो मर नहीं जाते,
सपनो में बदल गयी थी जिंदगी,
जागते तो सपने बिखर नहीं जाते,
तभी तो....
तभी तो
हमने रोक ली थी सांस,
हमने रोक ली थी सांस,
झपकने नहीं दिया पलकों को
और न खुलने दी आँख सो कर एक बार!
ताकि जो जैसा है वो रहे वैसे ही...
वैसा ही...!
वैसा ही...!
कुँवर जी,
जय हिंद,जय श्रीराम!