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रविवार, 28 नवंबर 2010

मेरी पहली कविता .....मै भी चाहूँ तू भी चाहे!...(कुंवर जी)

कभी-कभी जीवन में ऐसे पल आते है जिनमे हम कुछ भी नहीं कर पाते,और ये कुछ ना कर पाना ही बहुत कुछ कर जाता है!डिप्लोमा करते समय  3 वर्ष छात्रावास में व्यतीत किये थे!पहला अवसर था जब माँ के आँचल के तले से निकल कर कहीं बहार रहे थे!
तब पहला अवसर था जब किसी से दिल से जिदाव महसूस करने लगे थे!उसी दौरान एक मित्र जो काफी करीब हो गया दिल के, के साथ किसी बात पर असमंजस के साथ बोल-चाल बंद हो गयी!अब प्रत्यक्ष बोल-चाल तो बंद थी पर हम दोनों ही हमेशा ही साथ भी रहते थे और पास भी रहते थे,पर बातें नहीं होती थी!समझते तो थे दोनों एक-दुसरे को पर जो बात हो चुकी थी उसके कारण दोनों में से कोई भी बोलने की शुरुआत नहीं कर पा रहा था!वो समय भी बहुत ही स्मरणीय व्यतीत हुआ!इसी समय मेरे द्वारा पहली कविता लिखी गयी!मेरी पहली कविता आज आपके समक्ष है!

आप भी महसूस करे कि तक क्या-क्या और कैसे-कैसे गुजर रही थी हम पर......

कुछ ना कह के सब कुछ कहना,
मै भी चाहूँ तू भी चाहे!

साथ रहना साथ पढना,
साथ खाना,साथ खेलना,
पर अनजानो  की तरह ही साथ जीना,
मै भी चाहूँ तू भी चाहे!



ना बोलूं ना तू पुकारे,
तू मुझे बस देख जरा रे,
इस बात को कोई ना समझा रे,
इस दोस्ती को हम कैसे नकारे,
पास रह कर भी चुप रहना,
मै भी चाहूँ तू भी चाहे!



ये दोस्ती भी क्या-क्या रंग दिखाती,
पहले तो शीशे और पत्थर को पास बुलाती,
पत्थर को करती बदनाम,शीशे को रुलाती,
रो-रो कर अकेला महफ़िल में हँसना,
मै भी चाहूँ तू भी चाहे!


पत्थर की फितरत को तो खुदा ने ऐसा ही बनाया,
जिसको,जैसे भी मिला उसी को रुलाया,

यूँ ही पत्थर और शीशा बन के रहना,
मै भी चाहूँ तू भी चाहे!



जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुंवर जी,


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