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शुक्रवार, 5 अगस्त 2011

तो आत्मा पे अब कैसा ये बोझ...!(कुँवर जी)

मै हूँ भी या नहीं
इसी असमंजस में
टूट जाता है
भौर वेला में चलता
कोई सुखद सा  सपना
रोज!

परिवार सहारे मेरे..
हुह,
और मै भला किसके..?
जो भी हो 
जिम्मेवारी तो मेरी ही है,,,
और फिर
सब कुछ भ्रम है,
ऐसा कोई कहे..
तो आत्मा पे अब कैसा ये
बोझ!

जय हिंद,जय श्रीराम,
कुँवर जी, 

गुरुवार, 3 फ़रवरी 2011

जिन्दगी दौड़ रही है,तेज बहुत तेज...

जिन्दगी दौड़ रही है,तेज बहुत तेज...
हमको वही दूर कहीं छोड़...तेज बहुत तेज दौड़ रही है ये!


भाव सारे है यहाँ,कुछ कम कुछ ज्यादा....
बस कुछ को कुछ के ऊपर ओढ़...तेज बहुत तेज दौड़ रही है ये....


सपने दिखाती है,आँखे खुल भी जाती है कभी,
कभी सपनो को कभी हमें तोड़...तेज बहुत तेज दौड़ रही है ये....


मै साथ तो हूँ इसके,यही सोचता हूँ अधिकतर मै,
पर उसी पल मुझे झिंझोड़... तेज बहुत तेज दौड़ रही है ये...

गुरुवार, 23 दिसंबर 2010

सब कुछ तो है.....(कुंवर जी)

सब कुछ तो है,
थोड़ी सी खुशिया,थोडा सुकून;
और थोडा सा चैन ही तो नहीं है!
और हाँ आस भी तो है!

सब कुछ तो है,
छोटी सी ज़िन्दगी,पाषाण सा तन,
और ये शिला सा स्थिर मन सब यही है!
और हाँ रुकी-रुकी सी सांस भी तो है!
देखा;सब कुछ तो है,





जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुंवर जी,

बुधवार, 24 नवंबर 2010

खुशियाँ लौट आती है,.....(कुंवर जी)

पता है,
खुशियाँ लौट आती है,
हमें थोडा सा तडपाती है,
थोडा तरसाती है,
पर हमारे बिना रह भी तो नहीं पाती है!
तो वापस लौट आती है!

फितरत नहीं है ना उनकी कहीं रुक जाना एक जगह ,
हर किसी से मिलने की  खातिर,
वो हमसे दूर चली जाती है!
पर वो रूठती थोड़े ही है हमसे,
थोड़ी अपनी याद दिलाती है,
थोडा सा हमारा मज़ाक उडाती है,
और
हम पर हंसती हुई फिर लौट आती है!

ज़िन्दगी जो रास्ता है तो मोड़ तो आयेंगे ही,
जो खेल तो जीत-हार सही,खुशियाँ भी हमें चलाती है!
थोड़ी सी खेलती हमारे साथ,
कभी जिताती कभी हराती है,
हर मोड़ के पार बुलाती है.
थोड़ी देर में ही सही
पर खुशियाँ लौट आती है!


जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुंवर जी,


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