गुरुवार, 10 जून 2010

खामोशियों की जुबाँ समझे तो मायने बदल जाते है बातो के.....(कुंवर जी)

खामोशियों की जुबाँ समझे
तो मायने बदल जाते है बातो के,
असमंजस में है कि बातों के मायने बदले
या बात पुरानी रहने दे....

जिस्मानी जुबाँ का अंदाज-ए-बयाँ तो
कुछ और ही अफसाना कह रहा,
अच्छा लगे तो मान ले वरना
अफसानात रूहानी रहने दे,

हौंसले अपने तो पस्त है
हाल-ए-दिल कहने में सुनने में,
ज्यादा परेशानी ना उठा
आँखों को ही सब कहानी कहने दे,

वैसे भी चुप रहना ही भला है
मेरा और तुम्हारा आजकल,
जो फिर कभी मिलने-मिलाने वाली
यें बातें आसमानी रहने दे.....

जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुंवर जी,

बुधवार, 9 जून 2010

तुझको मजबूर समझ मै लौट आया.....


मै कल तेरे दरवाजे तक गया
और लौट आया,

अन्दर जाना जी ने बहुत चाहा
पर मै लौट आया,

मन ही मन तेरा दर खटखटाया
और मै लौट आया,

लगा मुझे ऐसा कि
देख लिया है तुमने मुझे कहीं से,
तुमको भी अनदेखा कर मै लौट आया,

कुछ तो रह गया था मेरा वही पर,
उसे वहीँ छोड़ कर मै लौट आया,

मै लौट आया ये मेरी मजबूरी नहीं थी,
तुझको मजबूर समझ मै लौट आया...

जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुंवर जी,

सोमवार, 7 जून 2010

अब तो बस करो...


सुन लो ये मौन-क्रंदन,
उसका भी है
कुछ कहने का मन!

अभी चल रही थी
तैयारी उसके आने की,
अभी विचारो में तुम्हारे
पनप रहा है उसका दमन,

तब नहीं सोचा था
अब सोच रहे हो...
तब के अवसर को समस्या जान,
अब हल खोज रहे हो!


उजाड़ रहे हो
स्वयं तैयार किया हुआ चमन!


और तुमने कर लिया अपने मन का,
जब भी किया था,
अब भी कर लिया अपने मन का,
तुम पर शायद कोई असर नहीं पड़ा
इस दमन का,

निष्फल रहा तुम पर प्रहार
उस मौन क्रंदन का...

देख नहीं पाये तुम वो आंसू
जो बहा नहीं,
सुन नहीं पाये वो विलाप
जो किसी ने खुल कर कहा नहीं...

वह जो आया भी नहीं था..
वह भी सह गया..
अब तो बस करो...
मानव से कह गया...


जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुंवर जी,

शुक्रवार, 4 जून 2010

जीवन कोई दलदल है क्या........?....(क्षणिका)




जितना सुलझाना चाहता हूँ
उतना ही छटपटाता हूँ,
जितना छटपटाता हूँ
उतना ही धंसता जाता हूँ,
जीवन कोई दलदल है क्या........?
समझ ही नहीं पाता हूँ...
.
.
.

जय हिन्द जय श्रीराम,
कुंवर जी,

बुधवार, 2 जून 2010

जिकर करण के लायक नहीं और चुप रहया ना जावै, {हरयाणवी रागणी},

ये मन भी...बस कुछ भी कहीं भी महसूस करने लग जाता है,
नहीं सोचता चलो घर की ही तो बात है,पर नहीं...
इन शब्दों के आगे भला हमारी क्या बिसात है...?
घर की हो या बहार वालो की अब घात तो घात है....

आज कुछ आपबीती जो जैसे अनुभव की थी ज्यों की त्यों प्रस्तुत करने को मान कर रहा है.....भाषा हरियाणवी थी, थोडा-बहुत है भी फिर भी सभी के लिए सरल रूप में लिखने की चेष्टा की है....जहाँ थोड़े कठिन शब्द है साथ में सरल अर्थ भी दिया गया है.....



जिकर करण के लायक नहीं और चुप रहया ना जावै,
जितना मै चुप रहणा चाहूँ यो रंज जिगर नै खावै!

धोखा और लालच आजकल बेहवै सै नस-नस मै,
करते बखत(1) ना ख्याल करै के कर रहये हम आपस मै,                 (1)-समय
जिब(2) बस मै बात ना आती दिक्खै तो जान तक लेणा  चाहवै,                  (2)-जब
लुच्चे माणस(3) उच्चे हो रहये साच्चो नै दबावै!                                      (3)-आदमी

सिधा माणस मरया  चौगर्दै(1) तै रो रहया अपणे करम,                    (1)-हर तरफ से
तन कर राख्या बज्र का पर भित्तर(2) तो वो सै नरम,                          (2)-अन्दर
भाई शर्म-शर्म मै सारया लुटग्या और कैह्ता सरमावै,
थोथा चणा बज रहया घणा असल ना टोहया(3) पावै!                              (3)-ढूँढने से

जग मै साफ़ घर मै दागी काम आजकल ऐसा होया,
ईमान और धरम-करम तो बस बात्या(1) का होया,                                   (1)-बातो
रोया बुगले वाले आंसू और साथ  वो सबका चाहवै,
नाड़(2) काट ले टूक खोस ले पर सुद्धा कहलावै !                                        (2)-गर्दन

दो घडी ईमान गेर कै जब जिया जावै सुख मै,
इमानदारी की राह पै फेर क्यों जीवै जिंदगी दुख़ मै,
इसी रूख(1) मै सबकी सोच ना इस गड्ढे तै बहार आवै,                     (1)-इसी ओर
सोच सबकी वैसी ही होई अन्न वे जैसा खावै! 

धोखा आज करया हमनै कल होग्या यो म्हारे साथ,
 दो आन्ने  की पतीली और दिख जात्ती कुत्ते की जात,
बात सुन कै ही समझ ल्यो ना तो भुगते पाच्छै आवै,
आवाज ना सुर-साज और हरदीप फेर भी गाणा चाहवै!

जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुंवर जी,

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