शुक्रवार, 29 जून 2012

क्या धरा संतो से खाली हो गयी है?....(कुँवर जी)

क्या धरा संतो से खाली हो गयी है?
यदि नहीं तो आज सन्त कौन है या कौन हो सकता है?

आभी समय ऐसा हुआ जाता है कि हर मनुष्य तुरन्त परिणाम पाना चाहता है!उसे कैसे-क्या करना है इसका ज्ञान नहीं है!फिर अध्यात्म या धर्म सम्बन्धी विषय की जानकारी भी उसे नहीं है,कम से कम जितनी होनी चाहिए उतनी तो है ही नहीं!कही सुनी बातों पर ही वह भागा फिरता है!उसके जीवन में परेशानिया जितनी है उस से भी अधिक उसकी जरूरते है,जिनको पूरा करने के चक्कर में किसी ओर बात पर वो ध्यान नहीं दे पा रहा है!वो चाहता है कि उसके जीवन की भौतिक जरूरते पूरी करने वाली दिनचर्या भी यथावत चलती रहे और आनन्-फानन में अध्यात्म की जानकारी भी ले ले,या सीधे ही परमात्मा का साक्षात्कार भी कर ले,क्योकि उसने सुना है कि यही परम अवस्था है,यही हमारे होने का उद्देश्य है!
अब समस्या यह है कि उसे इस विषय के बारे में केवल सुना है,तेरे-मेरे के मुह से,जिन पर उसे इतना विश्वाश नहीं है!ऐसे में उसे ध्यान आता है कि बिन गुरु भी निस्तार नहीं है!वही उसे सच्चा ज्ञान देगा जो उसकी भौतिक जरूरतों को पूरा करते हुए परमात्मा-प्राप्ति का मार्ग पक्का करेगा!

यहाँ एक और भावना उभर कर आती है,वो है "आस्था और श्रद्धा" की! हमारी अपने गुरु में पूरी आस्था होनी चाहिए,कोई भी शंका हमारी श्रद्धा से ऊपर नहीं होनी चाहिए!फिर गोबिंद से पहले गुरु-पूजन भी बताया है!अब यदि कोई अपने माने हुए गुरु में अंध-विश्वाश भी कर ले तो उसकी कहा तक गलती है!यदि विश्वाश ना करे तो उनकी परीक्षा लेना भी तो उचित नहीं लगता है!
हाँ!विश्वाश करने,उसे अपना गुरु मानने से पूर्व हम उसकी जांच-परख कर सकते है!लेकिन आज जनसँख्या ही इतनी हो गयी है कि बस अड्डा,हस्पताल,रेलवे स्टेशन और (यहाँ तक के)हर धर्म-स्टेशन  पर बहुत बड़ा जन समूह दिखाई देता है!किसी पर भी विश्वाश कर लेने का एक बहुत बड़ा कारण ये देखा-देखी भी है!सोचते है,अब इतने सारे लोग पागल तो ना होंगे!
उसके ऐसा होने के कारणों पर अलग से चर्चा चलनी चाहिए!

लेकिन असल प्रशन जो अभी चित में कुलाचे मार रहे है वो ये कि,माना पाखण्ड ने अपने पैर पूरी तरह से पसार रक्खे है,लेकिन  जब पहले भारतवर्ष में ऋषि-मह्रिषी हुए है और होते रहे है तो आज भी कोई ऋषि-मह्रिषी कहलाने के लायक  व्यक्तित्व अस्तित्व में है या नहीं?क्या जो दिखता है वो सब पाखण्ड ही है?और जो पाखंडी अभी धर्मगुरु बना फिर रहा है(चाहे वो कोई भी हो) क्या ये उस पर परमात्मा कृपा नहीं है,और जो उसके बहकावे आ रहे है उन पर किस कि कृपा हो रही है?

जय हिन्द,जय श्री राम,
कुँवर जी,

मंगलवार, 26 जून 2012

हाय संस्कृति......!(कुँवर जी)

 नवीन कॉलेज  की छुट्टियों में अपने भाई विकास के पास दिल्ली आया हुआ था!विकास यहाँ नौकरी कर रहा था पिछले कई सालो से!अब वो तो सुबह निकल गया ऑफिस,पीछे नवीन पांचवे माले पर बने गाँव की रसोई से भी छोटे या उतने ही बड़े कमरे में टीवी के रिमोट को दबाता रहा!दोपहर का समय तो जैसे-कैसे कट गया,पर शाम को..... रोया  तो नहीं था वो; पर..... !

घूमने की सोच कर बहार निकला,थोडा  भटकने पर ही एक पार्क उसे दिखाई दिया!वहा पहुँच कर उसने थोड़ी खुल कर सांस ली,शायद वही उसे कुछ पेड़ दिखे थे पूरे रस्ते में!कुछ बुजुर्ग वहा टहल रहे थे, कुछ टोली बना ताश खेल रहे थे!एक कोने में दो पोल पर नेट बंधा था,वालीबाल का था शायद,पर खेलने वालो की बाट  जोह  रहा था!वहा  आने-जाने वाले को वो बड़ी गौर से देख रहा था!उसने महसूस किया जैसे बुजुर्गो को छोड़ सभी किसी जल्दबाजी में है!भाग रहे है बस!अधिकतर तो कान पर फोन चिपकाए है!कोई परिचित दिखा तो चलते-चलते ही हाथ मिलाया अथवा तो दूर से ही मुस्कुरा कर हाथ हिला दिया!और सामने वाले ने भी चलते-चलते ही हाथ हिलाया और... चला गया!हाँ,हाय जरूर बोल रहे थे!

नवीन को ये बात बहुत ही अधिक अजीब लगी,बताओ... किसी को किसी से बतियाने का भी समय नहीं है!बस दूर से ही हाथ हिला दिया..?और सामने वाला भी शायद ऐसा ही चाह रहा हो!रात को खाना खाते समय उस से रहा न गया और जो देखा था उस पर वयंग्य करते हुए बोला,"भाई;यहाँ आकर एक नया फैशन देखा है!कोई जानकार यदि राह में मिल जाए तो फोन कान पर लगाओ और हाथ हिला दो,हाय!सामने वाला भी सोचता है कि चलो शुक्र है दूर से ही मिल लिए नहीं तो पता नहीं कितना समय खराब करवाता,तो वो भी इस से खुश होकर दूर से ही हाथ हिला,हाय  कर एक और चल पड़ता है!ये भी खूब है,इसे तो नाम देना चाहिए हाय संस्कृति! " 

जो ग्रास मुह में जा रहा था उसे वही रोक कर विकास नवीन को देखता है और फिर खाने लग जाता है!भोजन करने के पश्चात जब दोनों बहार टहलने के लिए निकलते है तो विकास नवीन के काँधे पर हाथ रख कर बोलना शुरू करता है.."तुम ने बिलकुल ठीक पहचाना इस हाय संस्कृति को नवीन!पर थोडा सा गलत समझ गए इसके बारे में!यहाँ गाँव की तरह किसी के पास इतना समय नहीं है कि वो हर मिलने वाले परिचित से जितना चाहता है उतना मिल पाए!हर कोई घर से 10-11  घंटो बाद ऑफिस के तनाव से लगभग निकलते हुए घर की और भाग रहा होता है!घर पर उसके परिजन किस हाल में है,घर क्या कुछ ले के जाना था,क्या ले लिया है सब उधेड़बुन भी चल रही होती है!ऐसे में अपने लिए समय नहीं निकल पाता पर  जो संस्कार हम में है कि हर परिचित के कुशल-क्षेम की जानकारी लेते रहने के वो अब भी काम रहे होते है!
 हाँ आराम से बतियाने का समय नहीं है पर,... पर दूर से ही हाथ उठा कर सामने वाले से उसका कुशल-क्षेम जाने चाह हम जाहिर करते है!दूर से ही मुस्कुरा कर उसे कहते है कि,मेरी चिंता मत करना मै ठीक हूँ,आप अपने बारे में बताये! सामने वाला भी हाथ उठा कर हमें महसूस करवाता है वो भी मजबूर है,समय उसके पास भी नहीं है पर ठीक वो भी है!"

नवीन जैसे सांस लेनी भी भूल गया हो पर सब सुन और महसूस जरुर कर रहा था!अब उसके मन थोड़ी ग्लानी थी जो विकास ने भी अनुभव की!सामने ही कुल्फी वाला था,विकास ने दो कुल्फी ली और गाँव की बात छेड़ दी!दोनों बतियाते हुए वापस कमरे की और चल दिए!

जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुँवर जी,  

मंगलवार, 12 जून 2012

कुछ लपटे तो वहा भी उठ रही थी!.....(कुँवर जी)

हर और आग थी,
जलन थी,
धुआँ...

बड़ी मुश्किल से एक कोना ढूँढा ...
बैठे,
कुछ अपने दिल में झाँका,
देखा...
कुछ लपटे तो वहा भी उठ रही थी!
अब..?


जय हिन्द,जय श्रीराम!
कुँवर जी, 

लिखिए अपनी भाषा में

Google+ Followers