बुधवार, 16 मई 2012

आश्चर्य ही आश्चर्य ...... (कुँवर जी)

प्रकाश-पुन्ज को 
अभी निहारा भी न था
जी भर के,
ना समेटा ही था अभी
आश्चर्य 

आँखे खुलने का,
कि तभी
शाम का डर समां गया मन में,
सूरज के भी ढलने का रोमांच
डरा ही तो रहा था!

तम के वहम से सहमा मन
और भी चकित हो गया
जब
देखा कि
तम को भेदती हुई
वो महीन सी किरण
विराट हुई जाती है
फूटी है मुझ ही से...

जय हिन्द,जय श्रीराम!
कुँवर जी,

शुक्रवार, 11 मई 2012

शब्द गूंगे हुए तो तड्पी कलम...(कुँवर जी)


शब्द गूंगे हुए तो तड्पी कलम...

एक पल के लिए..
फिर सोचा
इसमें मेरा तो कोई दोष  नहीं!


शिथिल हुए हाथ तो रोया मन
एक पल के लिए
फिर सोचा
मैंने तो खोया अपना होश नहीं!

न कुछ कर-कह सके
तो रोई  आत्मा,
पर इस से ही तो 

ख़त्म हुआ उसका रोष नहीं!

जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुँवर जी,

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