शुक्रवार, 18 मार्च 2011

उम्मीदों के रंग में रंगने की बारी आज है....

मलाल के गुलाल से ही
होली खेलते आये थे अब तक हम,
उम्मीदों के रंग में
रंगने की बारी आज है!
धैर्य के राग पर
मन अपना साज़ है,
आँखों के सुर पे
मौन ही आवाज़ है,
क्योकि बोलने वालों को तो
यहाँ तौलने का रिवाज़ है,
और कोई तौले हमें
इस से दिल नासाज़ है!

जय हिंद,जय श्रीराम,
कुंवर जी,

मंगलवार, 1 मार्च 2011

अपनों के बीच में आज अर्जुन नहीं दुर्योधन है....(कुंवर जी)




कल जब 
अमित जी की ओजपूर्ण कविता  को पढ़ा तो काफी दिनों के बाद कुछ पंक्तियाँ एक दम दिल से निकल कर आई....




अपनों के बीच में आज अर्जुन नहीं दुर्योधन है,
गीता गायी जाए तो किसके आगे ये भी उलझन है!

जो दिख रहा है उसे देख देख कर
छोटे से मन में बड़ी-बड़ी उधेड़बुन है!

बेशर्मी और बदनामी गौरव का कारण बन रही,
सच्चाई,ईमानदारी,देशभक्ति इनसे कहाँ अब जीवन है!

ठीक गलत के मायने सब बदल गए आज,
खिज़ा को ही बहार मान रहा खुद चमन है!

साधन और सुविधाओं को जुटाने को ही संघर्ष है,
साख और सोच में जैसे हो गयी कोई अनबन है!

जय हिंद,जय श्रीराम,
कुंवर जी,


लिखिए अपनी भाषा में

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