सोमवार, 31 मई 2010

क्या हमारा अपना इतना सामर्थ्य है की हम परमात्मा की दी हुई प्रेरणा को अस्वीकृत कर दे,उसे औचित्यहीन घोषित कर दे,बिना उसकी सहमती या आज्ञा के.....?-(एक विचार....)

आज बस एक प्रशन जिससे मै अकेला जूझता रहता हूँ!

"क्या हमारा अपना इतना सामर्थ्य है कि  हम परमात्मा की दी हुई प्रेरणा को अस्वीकृत कर दे,उसे औचित्यहीन घोषित कर दे,बिना उसकी सहमती या आज्ञा के.....?"


मै मानता हूँ कि 'शब्द' 'विचार' को अक्षरशः प्रस्तुत करने में असफल ही होते है और फिर उन असफल शब्दों से जो विचार बनेंगे क्या वो सफल सिद्ध होंगे.....?नहीं जानता....

तत्पश्चात भी मेरे विचारों के अधिकतम समीप जो शब्द मुझे जान पड़े वही आपके हवाले कर रहा हूँ...आज...!
जो कुछ भी आपके मस्तिष्क में चले इसे पढ़कर कृपया अवश्य अवगत कराये सभी को....क्या पता आपके बहाने किस को क्या मिल जाए........

जय हिंद,जय श्रीराम,
कुंवर जी,

गुरुवार, 27 मई 2010

ओ कान्हा के देस को जाने वाले...(अरज)

ओ कान्हा के देस को जाने वाले...
उसके संग बोल-बतलाने वाले...
उसे अपने संग हंसाने-रुलाने वाले...
एक अरज हमारी भी उसको सुना देना!


शब्दों के अर्थ करने में ही जो उलझा हुआ है...
अपनी नज़रो में ही जो सुलझा हुआ है...
पुष्प खिलने से पहले ही उसका मुरझा हुआ है...
उस मुर्ख को तुम समझा देना...
एक अरज हमारी भी उसको सुना देना!



हम-तुम सब एक है क्या होगा ये जान के...
चलना पड़े तुम्हे चाहे विरूद्ध विधान के...
पार पहुंचा ही दो उसे अनुमान के...
तुम उस से जुदा ही कहा हो बस ये दिखा देना...
एक अरज हमारी भी उसको सुना देना!


वो नादान अनजान तुच्छ धूलि-समान सही...
अभी तक भले ही ढोया  हो उसने अज्ञान सही....
अभी उसके मन में आया कोई और अरमान नहीं...
धुल से धरती तक का सफ़र उसे करा देना....
एक अरज हमारी भी उसको सुना देना!












जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुंवर जी,

बुधवार, 26 मई 2010

शायद इसलिए है सारे मौन...(कविता),

पहले तो मौन और फिर  पण्डित जी     को पढ़ा तो मन जो विचार उठे वो ही आज आपके समक्ष है.....

सब खुद से ही बोल रहे है,
अपमे मन को टटोल रहे है.....
अन्दर ही अन्दर खुद को तोल रहे है,
लगा अपनी आत्मा का मोल रहे है,
ऐसे में भला ओरो से बोले कौन....
शायद इसलिए है सारे मौन...


सभा सारी आपस में नजरे चुराए,
तिनका दाढ़ी में जान सब दाढ़ी खुजाये,
हमाम में सब नंगे पर्दा कौन हटाये,
इन्सानियत शायद जिन्दा है सो सब शर्माए,
धरती तो फट जाए पर समाये कौन,
शायद इसीलिए है सारे मौन...

जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुंवर जी,

मंगलवार, 25 मई 2010

वाह कह दे एक बार बस वाह कह दे,.....(हास्य-वयंग्य)

कवी हृदय पती साधारण पतियों से अधिक पत्निव्रता होता है,इसमें कोई दो-राही बात नहीं हैं!उदाहरण के लिए आप कालजयी फिल्म "नवरंग" देख सकते है!

कवी हृदय पती तो बस एक वाह का मारा होता है!पत्नी उसे दुत्कारती रहे,कोई इज्जत ना करे(वैसे ऐसे काम वो कम ही कर पाते है जिनसे उनकी इज्जत आदि में सकारात्मक फर्क पड़ता हो!) फिर भी वो उसके प्रति कोई वैर-भाव मन में नहीं पालते!हर बार वो नकारे जाते है फिर भी वाह सुनने की चाह उनसे एक प्रयास और करवा डालती है!

अपनी सारी लगन का वो बस एक मोल आंकते है..."वाह"!(क्या कहा,भले ही सच्चे दिल से ना हो? तो भाई साहब शुद्ध कुछ मिलता है आजकल?थोड़ी बहुत(या सारी भी) मिलावट तो स्वीकार्य है!सोच में लोच तो होनी ही चाहिए!

अब कल ही की सुन लीजिये......देर रात घर पहुंचे,पत्नी श्री हमारी तरह कविहृदय तो है नहीं,सो हमारे जितनी पतिव्रता तो वो.....मेरा मतलब है वो है तो.....बस अवसर पर दिखाने पर चूक जाती है बेचारी.....!

खाना-पीना हो चुका था,हमारे लिए बचा था या नहीं इसमें हमारी कोई रुचि नहीं थी!(रुचि होने से कोई फर्क भी नहीं पड़ने वाला था,पर हमारी सच में कोई रुचि नहीं थी!)
खट-खट ने जब रूकने का नाम नहीं लिया तो देवी जी प्रकट हुई या उन्हें होना पड़ा जो भी.....!द्वार खुला...लेकिन उसका मस्तिष्क नहीं!"आ गए" जरूर उसने मन ही मन में कहा होगा,लेकिन मैंने महसूस कर लिया था,इसी लिए तो उसका द्वार खोलते ही वापस चला जाना मुझे गलत नहीं लगा!

उसके इसी व्यवहार ने तो मेरे अहम् का समूल नाश कर दिया था,अर्थार्थ अब "शुद्ध कवी" ही बचा था!जो बस हर बार,हर बात में कविता खोजता फिरता है!हालांकि मै जान चुका था कि पत्नीश्री का क्रोध बस राख के नीचे दबी आग कि तरह ही है जो थोड़ी सी कुरेदने पर भी भड़क सकता है....पर.....कविहृदय.....इसका क्या करे!
जो कविता बना के लाया था वो तो अब पुरानी जान पड़ी या उसे सुनाने के लिए भूमिका बना रहा था,मै अब उसे एक तुरन्त बनायी कविता सुना रहा था.....

                                                               वाह कह दे एक बार
बस वाह कह दे,

खाना भले ही ना दे
तू बिना जिरह कह दे,
बस एक बार वाह कह दे,

जो भी कहना है वो
तू हो बेपरवाह कह दे,
बस एक बार वाह कह दे,मेरा दिल भी ना दुखे


कुछ इस तरह कह दे,
बस एक बार वाह कह दे,कुछ ना भी लगे लायक


तो भी बेवजह कह दे,
बस एक बार वाह कह दे!

जो भी मै कहूं
तू ठीक वही राह कह दे
बस एक बार वाह कह दे!
जय हिन्द,जय श्रीराम
कुंवर जी,

सोमवार, 24 मई 2010

मिट्टी मेरी.... न जाने कैसी है?-(कुंवर जी)

आज ही घर से वापिस आया हूँ!बहुत कुछ पढ़े बिना छूट गया होगा!
एक लम्बी यात्रा और वो भी बस में खड़े होकर..........थकान भी बहुत हो रही है!
कुछ भी नया जो लिखा गया उस से संतुष्टि सी नहीं मिली सो आज पुरानी कविता फिर आपके समक्ष........



किसी का भी दुःख मै नहीं बाँट सकता हूँ,
किसी की भी राहों से कांटे मै नहीं छाँट सकता हूँ,
पता नहीं कैसी मिट्टी है मेरी!

जो मुझे जैसा समझता है मै वैसा ही हूँ मै,
जो खुद को जैसा भी समझता है वैसा भी हूँ मै,
पता नहीं कैसी मिट्टी है मेरी!

ऐसे तो हाड़-मांस कि ही हूँ मै,
पर नहीं किसी के विश्वाश का हूँ मै,
पता नहीं कैसी मिट्टी है मेरी!

गीली सी मिट्टी मानो,कुछ भी घड़ लो,
कोरा कागज़,जो मर्जी लिखो और पढ़ लो,
कुछ-कुछ ऐसी मिट्टी है मेरी!

हर-दीप जल कर बुझ जाता है,
अँधेरा पहले भी था,वही बाद में भी नजर आता है,
कुछ-कुछ ऐसी मिट्टी है मेरी!

पर शायद मिट्टी भी मेरी कहाँ है?
धुल सी,अभी यहाँ,अभी न जाने कहाँ है?
कुछ-कुछ ऐसी मिट्टी है मेरी!

मिट्टी मेरी....
न जाने कैसी है,
है! पर न होने जैसी है!
जय  हिन्द,जय श्रीराम,
कुंवर जी,

शुक्रवार, 21 मई 2010

माँ के ख़यालात में....(कुंवर जी)

हँसता-गाता,
खेलता-खाता,रोता-नहाता,
रूठता-मनाता
भी मै शायद अधुरा ही होता हूँ!

आंसुओ के अहातो में
दुखो के अखाड़ो में,
मुश्किलों के पहाडो में
अपनों के मेलो में
परायो के झमेलों में,
भी शायद मै अधूरा ही होता हूँ!

माँ के ख़यालात में,
और जब कलम होती है हाथ में

तो ही मै पूरा होता हूँ!
जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुंवर जी,







गुरुवार, 20 मई 2010

मै समझ नहीं पा रहा हूँ कि मै कैसे पूछूं!(वयंग्य)

मै समझ नहीं पा रहा हूँ कि मै  कैसे पूछूं!
क्या वर्ण वयस्था उचित थी या है या हो सकती है?
उस हिसाब से चार वर्ण-एक पंडित जो ज्ञान बांटता है,एक क्षत्रिय-जो अपनी जान की भी परवाह नहीं करता दूसरो की रक्षा करने में,एक वैश्य-जो सभी के लिए 'अर्थ' को सही अर्थो में प्रयोग करता है,व्यापार करता है,एक शुद्र-जो सेवा करने में ही अपनी मुक्ति जानता है!
अब ये नेता नामक प्राणी किस वर्ण में आएगा?
आदरणीय गोदियाल जी की पोस्ट अर टिप्पणी करते समय आया ख्याल आपके हवाले...
कृप्या सभी वर्णों की गरीमा और सम्मान को ध्यान में रख कर जवाब देना!
मुझे आपसे बहुत उम्मीदे है.....
जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुंवर जी,

बुधवार, 19 मई 2010

मै नहीं मानता कि ब्लॉगजगत केवल आतंकवादियों और उनके समर्थको से या नपुन्सको से ही भरा पड़ा है!

यहाँ सुनील जी को पढ़ा  तो मुझसे रहा ना गया!मै वहा भी इस बात पर अपनी असहमति उनसे जता चुका हूँ!पर लगा वो पर्याप्त नहीं है!

मै नहीं मानता कि ब्लॉगजगत केवल आतंकवादियों और उनके समर्थको से या नपुन्सको से ही भरा पड़ा है!एक-आध गन्दी मछली तालाब को गन्दा दिखा जरुर सकती है पर उसे गन्दा नहीं कर सकती!मेरा तो ऐसा ही मानना है!हम सभी की एक पहचान बन गयी है!भले ही वो हमने ही बनायी हो,बन गयी है!बस उसी को सजाने,सवांरने के चक्कर में हम कई जगह,जहाँ विरोध जरुरी है विरोध और जहाँ समर्थन जरुरी है समर्थन नहीं दिखा पाते!ये हमारी मजबूरीतो है पर  कमजोरी नहीं हो सकती!कुछ पंक्तियाँ यहाँ प्रस्तुत करना चाहूँगा....

जो मजबूत है
वो मजबूर भी तो हो सकता है,
जो हो गया प्रभु मर्जी जान
उसे मन्जूर भी तो सकता है,
मौन उसका
प्रतिशौध का तंदूर भी तो हो सकता है,
भ्रम कैसा भी हो
वो दूर भी तो सकता है!


हिन्दू बेचारा नहीं है,
उनको बेचारा जान सहम जाता है,
विनाश देखा है कई बार उसने,
इसीलिए उन पर रहम खाता है,
अपनी बलि देकर भी शांत हो जाए माहौल,
ये सोच मरता जाता है,
ना कुरेदो उसकी आत्मा को,
भड़का तो तांडव भी वो मचाता है!

कुछ तो उन्ही की पोस्ट पर टिप्पणी स्वरुप पहले भी लिखी जा चुकी है कुछ नयी है!मै बस यही बताना चाह रहा हूँ कि
यहाँ कोई भी कमजोर नहीं मजबूर नहीं,
बस वो मान बैठे है कि हम उस परमात्मा के नूर नहीं,
बस थोडा मुह फिर गया है सच्चाई से,वो सच से दूर नहीं,
सच्चाई है कडवी तो लगेगी ये कोई लड्डू मोती चूर नहीं!

जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुंवर जी,















कुंवर जी,

मंगलवार, 18 मई 2010

कमी अपनों की खलती ही है!-(कविता)

रातो में,
बातो में,

कभी खयालो में
कभी हालातो में,

कभी जोश में
कभी जज्बातों में,

किसी से बिछुड़ने पर 
किसी की मुलाकातों में,

मौत के हमले में,
कभी जिंदगी की घातों में,

बोझ होते रिश्तों में
कहीं नए जुड़ते नातों में
.
.
.
कमी अपनों की खलती ही है! 

जय हिन्द जय श्रीराम,
कुंवर जी,

सोमवार, 17 मई 2010

ये शब्द मेरे साथ आजकल कबड्डी खेल रहे है!-(कुंवर जी),(कविता)

ये शब्द
मेरे साथ
आजकल कबड्डी खेल रहे है!
मै सोचता हूँ
इस बार तो
धर-दबोचुन्गा,
तैयार भी हो जाता हूँ
पूरी तरह!
पर पता ही नहीं चलता
कब-कैसे वो
बोनस भी ले जाते है!
और मै खड़ा देखता रह जाता हूँ!

अब मै कसता हूँ लंगोट
एक बार फिर,
हाथो को लगाता हूँ
मिट्टी भरपूर,
मुट्ठियाँ भीन्च,
त्योरिया खींच,
घूरता हूँ मैं शब्दों को....

खिलखिला कर हँसते है
वो मुझ पर....
कहते है
हम थक गए,
अभी खेल ख़त्म....
और मै खड़ा देखता रह जाता हूँ!

जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुंवर जी,

शुक्रवार, 14 मई 2010

अपने अनुभव रूपी ज्ञान का दूसरो के लिए भी प्रयोग कर लेना चाहिए!फायदा अपना भी होगा और दुसरो का भी!कुछ सीखो यहाँ से-कुंवर जी,(हास्य-वयंग्य)

हमें अपने अनुभवों का लाभ सभी को देना चाहिए!ऐसा मेरा मानना है!ऐसी ही एक घटना मै आपको सुनाने जा रहा हूँ,शायद उसके बाद आपका भी ऐसा ही मानना हो जाए!


हुआ यूँ कि हम और राणा जी,किसी पार्टी में शिरकत करने पहुँच गए!अब ये बताने का कोई औचित्य नहीं लग रहा कि हम आमंत्रित भी थे या नहीं!भई दोस्त की हर चीज हमारी,फिर न्योता क्यों नहीं?


आपको ऐतराज हो तो बताओ.....!


हाँ तो वो दोस्त कुछ बी पी एल वाली लाइन से बहुत ऊपर का था,उसकी पार्टी भी वैसी ही होनी थी!


हम थे गाँव के गंवार,पत्तलों पर नीचे बैठ कर खाने वाले!वैसी सी पार्टी का पहला अनुभव जी हम दोनों का!तो लगभग साथ-साथ विचर रहे थे हम दोनों,चरने के लिए!


पर शायद कोई ख़ास समय निश्चित नहीं था उसके लिए!कुछ तो जाते ही जुट रहे थे और कुछ ना जाने क्या तलाश रहे थे!


इस बीच हम दोनों थोड़ी देर के लिए अलग-अलग भी हो गए थे!


एक भाई साहब प्लेट में ना जाने क्या लिए जा रहा था!बस समीप आकर धीरे से बोला "जल जी"!


हमने हाथ बढ़ाया ही था कि उधर से राणा जी की आवाज आई,"कुंवर जी,रहने दो;कोरा पानी है वो,मै भी धोखा खा गया था!"


हमने धन्यवाद कहा जी मन ही मन में राणा जी का!बोल देता तो खामख्वाह ही सर पर चढ़ जाते,सो मन ही ,मन में कह दिया था!


हम अभी भी विचार ही रहे थे,राणा जी ने कहा शुरुआत कर ही डालते है!हम तो इन्तजार ही इसी बात का कर रहे थे,और आँखों ही आँखों में इशारा कर दिया जी!


राणा जी ने प्लेट उठायी जी,उस में कुछ सफ़ेद-सफ़ेद मुलायम-मुलायम सा कुछ था!हाथ लगाते ही बड़ा अच्छा लग रहा था!राणा जी ने सोचा कुछ नया सौदा है खाने का!हमने भी देख लिया!जैसे ही उन्होंने उसे उठा कर मुह की और बढ़ाया,हमने टोका!


अब बारी हमारी थी!राणा जी के एहसान उतारने की भी और अपने अनुभव का लाभ राणा जी को देने की भी!


हमने राणा जी को लगभग समझाया,"रहने दो राणा जी,मै देख चुका हूँ!बिलकुल फीका है,कोई सब्जी भी ले लेते है साथ में!"

पास में एक जनाब हमें बड़े गौर से देख रहे थे!उन्होंने हमारी मानसिक और सामाजिक हालत को समझते हुए हमें एक और ले जाकर समझाया,वो बोले."ये खाने की चीज नहीं,टिस्यू पेपर है!पोंछने के काम आता है"


हमने उन्हें अपना अनुभव हमें बताने का धन्यवाद तो किया ही किया,साथ में अनुभव रूपी ज्ञान को बांटना भी सीखा!


आपने कुछ सीखा!


जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुंवर जी,

गुरुवार, 13 मई 2010

देखना कैसे-कैसे मर्द है यहाँ?-कुंवर जी,

बैलगाड़ी धेरे-धीरे टुमक-टुमक चल रही थी जी!अब वो तो बैलगाड़ी थी ऐसे ही चलनी थी!जितने यात्री उसमे बैठे वो बोर भी नहीं हो रहे थे,सभी को आदत थी उसमे सफ़र करने की!
उनमे एक भाई साहब कुछ अलग से दिख रहे थे!सौभाग्य से या दुर्भाग्य से घडी केवल उन्ही के पास थी वहाँ!किसी ने पूछ लिया कि समय क्या हुआ है?
उन्होंने घडी में देखा,बोले दो बजने वाले है!
उस बैलगाड़ी में कोई कही से सवार था कोई कहीं से!आपस में इतना परिचय भी नहीं था!और वो धीरे-धीरे टुमक-टुमक चल रही थी!
काफी देर बाद उस घडी भाई साहब से किसी ने फिर समय पूछ लिया!अबकी बार उनकी व्यक्तिगत समस्याओं का असर उनके चेहरे पर नजर साफ़ आया!उन्होंने घडी में देखा और बोले दो बजने वाले है!
सुनने वाले को अजीब तो लगा पर वो कुछ कह नहीं पाया!शायद शीष्ट्ता  आड़े आ रही थी उनकी!
पर घडी भाई साहब अपने व्यक्तिगत जीवन के अनुभवों में ही फसे पड़े थे अब भी!उन्हें नहीं पता वो क्या कह रहे है!उन पर कोई असर ही नहीं!
और बैलगाड़ी पर तो खैर क्या फर्क पड़ना था इस बात का!वो तो धीरे-धीरे टुमक-टुमक चल ही रही थी!


अब वो सभी अनजान थे और सभी पुरुष,सो एक-दूसरे से कोई ज्यादा बात-चीत भी नहीं हो रही थी उनके बीच!अब फिर किसी ने समय पूछ लिया उन घडी भाई साहब से!
पहले तो उसने समय पूछने वाले को लगभग घूरा,फिर अचानक उस पर कृपा करते हुए घडी को देखा और बोला-"दो बजने वाले है!"
अबकी बार सभी घडी भाई साहब को एक-टक देखने लगे!इस पर उसकी सोच में भी जैसे किसी ने 'ठहरे हुए पानी में पत्थर सा मार दिया हो'वाला काम कर दिया!उन्हें लगा कि शायद कहीं कुछ गलत है!उन्होंने घडी को देखा वो सच में दो बजाने ही वाली थी!


अब उसने सोचा,घडी जब घर से चला तो  ठीक थी,शायद अब खराब हो गयी होगी!लेकिन उसे पिछली दो-तीन बार समय पूछने वाली बात भी स्मरण हो आई थी!अब वो मन ही मन लज्जित तो हो रहा था पर और किसी को इस बात का पता ना चले ये भी चाह रहा था!
दुसरे लोग भी इस बात को भांप चुके थे!उनमे से किसी एक ने शिष्टता के घूघट को थोडा उघाड़ते हुए,हिम्मत कर के कह ही दिया."भाई साहब,पिछले ढाई घंटे से दो नहीं बजे क्या?"
अब तो घडी भाई साहब को जैसे सांप सूंघ गया हो!एक दम तो कुछ नहीं बोले!पर शायद हरियाणे के थे!तुरन्त-बुद्धि उन्हें कहा जाता है!
हर बात का जवाब वो अपने हिसाब से ही देते है!अब घडी खराब है,ये स्वीकार कर लिया तो जो घडी होने का रौब वो अब तक अप्रत्यक्ष रूप से जमा रहे थे,सब ख़त्म!अब वो भी बचाना था और इज्ज़त भी!
वो शान से बोले-"रै बावले,या मर्द की जुबान सै, जो एक बै कह दिया सो कह दिया,मिनट-मिनट पै ना बदलेगी!"


सभी कुछ भी कहने के लिए स्वतंत्र तो थे,पर क्यों खामख्वाह में बुराई ले,ये सोच कर चुप भी थे!इस से बैल गाडी पर भी कोई फर्क नहीं पड़ रहा था!वो तो अब भी यूँ ही धीरे-धीरे टुमक-टुमक चल ही रही थी!


अपनी बात कहने के लिए एक पुरानी बात को अपने हिसाब से प्रस्तुत किया है!आशा है आप मेरे इस असफल प्रयास को समझने की सफल कोशिश करेंगे!




जय हिन्द,जय श्री राम,
कुंवर जी,

बुधवार, 12 मई 2010

अब मै सोचता हूँ कि क्या शराबी को प्रमाण पत्र मिल जाता है कुछ भी कहने का!क्या उसे सच में होश नहीं होता?और जो अपने होशो-हवाश में पागलपन दिखाए उनको क्या कहे...?-कुंवर जी,

एक बार एक शराबी गली में खड़ा सभी आने जाने वालो को गालिया(वो भी बेहद गन्दी वाली) दे रहा था!सभी परेशान तो थे पर सोच रहे थे चला जाएगा,सो कुछ नहीं बोल रहे थे!


अब हो गयी बहुत ज्यादा देर,आदमी-औरत सभी तंग!जो मुसाफिर थे,वो चले जाते,जो वही रहने वाले थे वो तो तड़प रहे थे उसके मुख से ये सब सुन-सुन कर!अब किसी नए खून से रहा ना गया और वो उलझ गया जी उस से!तब एक बुजुर्गवार बोले-"अरे वो तो शराबी है!तुन क्यों उसके साथ पागल हो रहे हो!"

अब मै सोचता हूँ कि क्या शराबी को प्रमाण पत्र मिल जाता है कुछ भी कहने का!क्या उसे सच में होश नहीं होता?

से रोकने का कोई कारण नहीं?और जो अपने होशो-हवाश में पागलपन दिखाए उनको?

जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुंवर जी,

भाई जान;क्षमा करना,मै तो बस आपसे बात करना चाहता था और आपने तो अपने पूरे समाज की जिम्मेवारी अपने सर पर ले ली!और उसी समाज ने आपको अकेला छोड़ दिया!लेकिन मै आपके साथ हूँ-कुंवर जी,

वैसे मै ऐसे मुद्दों को एक दिन से ज्यादा घसीटने में विश्वाश नहीं रखता!लेकिन भाई जान इस से महीने भर से चिपटे हुए है तो क्या मै दो दिन भी नहीं खेल सकता !

सलीम भाई जान;क्षमा करना,मै तो बस आपसे बात करना चाहता था और आपने तो अपने पूरे समाज की जिम्मेवारी अपने सर पर ले ली!और उसी समाज ने आपको अकेला छोड़ दिया!लेकिन मै आपके साथ हूँ!इसके लिए मुझे अपने कई भाइयो की नाराजगी भी जायज लग रही है!
पर सवाल तो ये है कि आपके समाज से क्यों कोई आपके साथ नहीं आया!सभी ने आपको अकेला छोड़ दिया!आप तो हर बार उनकी कही हर बात(गलत या ठीक ये मायने नहीं रखता) का खुला समर्थन करते थे!फिर क्यों कोई नहीं आया आपके लिए दो बोल भी लिखने!मुझे लगता है कोई भौतिक मज़बूरी रही होगी उनकी!या बात कुछ और है.....?

मैआपकी इस भावना कि "इस्लाम में पुनर्जन्म सम्भव नहीं" का पूरा सम्मान करने लगा हूँ!
पर ये नादाँ पता नहीं कौन है जो ये

"وَرَبُّكَ الْغَنِيُّ ذُو الرَّحْمَةِ إِن يَشَأْ يُذْهِبْكُمْ وَيَسْتَخْلِفْ مِن بَعْدِكُم مَّا يَشَاء كَمَآ أَنشَأَكُم مِّن ذُرِّيَّةِ قَوْمٍ آخَرِينَ 133 إِنَّ مَا تُوعَدُونَ لآتٍ وَمَا أَنتُم بِمُعْجِزِينَ 134

अनुवाद:
और तुम्हारा अल्लाह बेनियाज़ और रहमत वाला है। (इसलिये उसे ज़ुल्म करने की कोई ज़रूरत नही है) अगर वह चाहे तो तुम सबको मार कर तुम्हारी जगह जिसको चाहे पैदा कर सकता है, उसी तरह से जिस तरह से उसने तुम्हे एक दूसरी क़ौम से पैदा किया था।"

लिख रहा है!भाई इसको समझाओ आप,मुझे तो ज्यादा जानकारी नहीं है इस बारे में!
मैंने इसे यहाँ  पढ़ा.....

और ये अनजान राणा साहब क्या कह रहे है......
"भाई जान मे आप लोगो के इस झगडे मे नही पड़ने वाला, पर एक बात जो मेरे जहाँ मे आ रही हैं वो आपसे जरुर कहना चाहूँगा, और कुंवर जी से निवेदन हैं की वो ऐसी व्यवस्था करे की उनका जवाब मेरे तक भी पहुँच जाए

"भाई जान चलो ठीक हैं आप लोग पुनर्जनम मे विश्वाश नही रखते हो तो मेरे एक शक का समाधान जरुर कर दो


आपने कुछ ऐसा कहा हैं=-" की जो जहा जनम लेकर वही पे दबा दिया जाता हैं तो कयामत के दिन उसको वही से सीधे उठाया जाता हैं तो मुसलमान जयादा रास्ट्रवादी हुआ क्योंकि वो अपने देश मे ही दुबारा जनम लेता हैं मतलब था ये आपका
1. - तो भाई जान इसमें रास्ट्रवादी वाली कौन सी बात हुई . पहले तो आप ये बताइए की क्या एक मुसलमान जो इस देश मे आतंकवादी हैं तो मरने के बाद तो वो भी आतंकवादी ही बनेगा इसी देश मे, इसकी क्या गारंटी हैं की वो देशभक्त ही बनेगा. और अगर वो आतंकवादी ही बनता है तो "तो क्या पाकिस्तान और अफगानिस्तान का आज ये हश्र इसी कारण से हैं "
2.- और एक बात अगर जो दबा हैं वो कयामत के दिन वही से उठा लिया जायेगा तो फिर ये मुस्लिम आबादी कैसे बढ़ रही हैं क्योंकि आप तो ऐसा मानते हो की जो दबा हैं वो ही उठेगा, तो बाकी लोग कहा से आये ?
और एक बात आप सब से आपको मनुष्य जनम मिला हैं उसे ऐसे धार्मिक झगडो मे जिनका कोई और हैं ना कोई छोर हैं मे मत गवावो.
किसीके भी धरम से अच्छी बातें उठाओ सिरफ .
मेरे अपने मन मे ये सवाल आये हैं और ये किसी के धरम को नीचा दिखाने या अपने धरम का प्रचार करने के लिए नही हैं .
मे तो ये सिर्फ अपने मन मे आये चंद सवालों को संतुस्ट करने के लिए पूछ रहा हूँ
सलीम भाईजान से आग्रह हैं की अगर वो जवाब न देना चाहे तो कोई बात नही मगर अगर वो जवाब दे देते हैं तो मुझे अपने मुस्लिम भाइयो के धरम को समझने मे और मदद मिल जायेगी .
- संजीव राणा
हिन्दुस्तानी"


राणा जी ने यहाँ कही अपनी बात 

चलो मेरी ना सही इनकी सद्भावना की कद्र कर के ही कोई इन्हें संतुष्ट कर दे!

जय हिंद,जय श्रीराम,
कुंवर जी,

मंगलवार, 11 मई 2010

ब्लॉग-जगत की शान,आतंकवादी भाई जान,सलीम खान से एक छोटा सवाल अपना भी!पता नहीं वो बताएँगे या नहीं!मर्जी है उनकी आखिर नियत है उनकी!-कुंवर जी,

मै पिछले कई दिनों से अपने आप को इस विषय से बचाए हुए था!पर मन चंचल आखिर चंचलता दिखा ही गया!आतंकवादी भाई जान,मुस्लिम जगत की शान,सलीम खान का प्रेम मुझे खींच ही लाया दुबारा से इस खेल में!हालांकि वो भरे-पूरे मस्तिष्क के स्वामी है,इस पर किसी को भी कोई भी आपत्ति नहीं होगी!फिर पता नहीं क्यों.......?

पता नहीं क्यों वो एक बात पर अटक गए है!अब उनको बताने वाले एक तरह से छक भी चुके है और थक भी चुके है!अब मेरा इरादा भी उनको कुछ बताने का नहीं है!मै तो बस एक छोटी सी बात उन से ही पूछना चाह रहा हूँ!पता नहीं वो बताएँगे या नहीं!मर्जी है उनकी आखिर नियत है उनकी!

वो हर बार,बार-बार ये ही पूछ रहे है कि "अगर सावरकर जी का पुनर्जन्म अफ़गानिस्तान में तालिबान समर्थक में हुआ तो इस बात की गारंटी कौन लेगा कि भारत के ख़िलाफ़ किसी भी आतंकी घटना में वे लिप्त नहीं होंगे??? और अगर ऐसा हुआ तो उस राष्ट्रवाद का क्या होगा जिसे वीर सावरकर अपने कथित खून पसीने से सींचा था !!!??? "

तो भईया,मेरे सारे तर्क आपकी तार्किक  बुद्धि के आगे निष्प्राण है!मुझे अपनी शरण में आया जान,मुझे और सभी को ये बताने का कष्ट करे कि उपरोक्त वाक्य में सावरकर जी कि जगह आप अपने आदरणीय(हमारे लिए भी) पिताश्री को रख दे तो आपका क्या तर्क होगा!क्या ख्याल होगा इस बारे में!

 मान लीजिये आपके पिताश्री या दादा श्री का पुनर्जन्म पाकिस्तान या उस टाइप कि दूसरी जगह हो गया जो भारत के खिलाफ छदम या प्रत्यक्ष युद्ध में रत हो तो आपका कैसा वयवहार रहेगा उनके प्रति!
मुझे पूरा विश्वाश आप इसका सभी को(अपने समेत) संतुष्ट करने वाला उत्तर आज दे ही दोगे,और अपनी तर्कशीलता लोहा एक बार फिर ब्लोगजगत को मनवा के रहोगे!आज इस रहस्य का पटाक्षेप हो ही जाए!
आपका शुभचिंतक ही मानिए मुझे तो आप!

जय हिंद,जय श्रीराम!
कुंवर जी,

सोमवार, 10 मई 2010

अपने यहाँ बच्चे अभी इतने नहीं गिरे है!वो बस देखा-देखी ये सब कर रहे है!इसका सबसे सटीक और प्रत्यक्ष उदाहरण आप सब लोग है!क्यों क्या नहीं हो...........

हर रोज की तरह आज भी अपना ब्लॉग खोलने के बाद सबसे पहले अमित भाई साहब... को पढ़ा!अब जो ख्याल मन आये वो आपके समक्ष है!
माँ-बाप का ऋण एक दिन में चुकता करने की ये पश्चिमी सोच यहाँ भी अपने पैर पसारने काफी हद तक सफल होती दिखाई दे रही है!ये दुर्भाग्य ही तो है!अरे भगवान् का सबसे शुद्धतम रूप जो प्रत्यक्ष हमारे पास है वो माँ-बाप ही तो है!समस्त जीवन उनको देने पर भी हम उनका ऋण नहीं उतार सकते तो साल में एक दिन उनके नाम पर मस्ती करने से क्या ऐसा हो जाएगा?मुझे तो ब्लॉग खोलने के बाद ही पता लगा कि कल मदर्स डे था! लेकिन नहीं पता चला कल,इसके लिए मन कोई ग्लानी नहीं थी!क्योकि बीते कल में भी मेरे मन जो भावनाए थी मेरे माँ-बाप के प्रति वो वैसी ही थी जैसे बीते हुए हर एक कल में थी!

पश्चिमी समाज में ये सही हो होता होगा या हो सकता है!वहा की जीवन शैली ऐसी हो चुकी है की माँ-बाप जैसी चीज़ वहा याद नहीं रहती होगी बच्चो के!ऐसे में एक-आध दिन बच्चे मस्ती तो हर रोज वाली करे पर वो उस दिन अपने माँ-बाप के नाम पर करे तो उनके तड़पते माँ-बाप की तरसती आत्मा को ये ही सुख देने वाला लगता होगा!तो वहा तो उचित हो सकता है,लेकिन अपने यहाँ......!


अपने यहाँ बच्चे अभी इतने नहीं गिरे है!वो बस देखा-देखी ये सब कर रहे है!इसका सबसे सटीक और प्रत्यक्ष उदाहरण आप सब लोग है!क्यों क्या नहीं हो...........




गूगल पर माँ लिख कर खोजा तो चित्र के साथ ये कविता भी मिली!सोचा इसे भी शामिल कर लूं!पढ़ कर इसने मुझे सोचने पर विवश किया था,शायद आपको भी कर दे!











जय हिंद,जय श्रीराम!
कुंवर जी,


रविवार, 9 मई 2010

गुरुदत्त से गुलाल तक की ये दुनिया........जैसी है वैसी की वैसी ही बचा लो ये दुनिया!

 गुरुदत्त साहब की प्यासा एक अमर कृति है!उसी का ये गीत "ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है...." जब मैंने फिल्म में देखा था तो मै लगभग रो पड़ा था!मेरे पसंदीदा गानों में से एक ये भी है!कल ही मेरे एक मित्र से हल्की-फुलकी बहस हो गयी ये लेकर कि ये गाना किस फिल्म का है!

वो भई साहब बोले ये गाना तो गुलाल फिल्म का है!अब मै इस पर थोडा मुस्कुराया,बोला कि नहीं,'प्यासा' का है!मै नयी फिल्मे लगभग ना के सामान ही देख पता हूँ और वो भई पुरानी!बस यही सोच कर मै अड़ा रहा इस बात पर कि ये तो प्यासा का ही है!वो भी पूरे आत्मविश्वाश से कह रहा था कि ये तो गुलाल का है!मुझे उसकी नासमझी पर तरस खाकर उसे प्यासा फिल्म का ये गीत सुना दिया,रफ़ी जी आवाज में!
अब मै तो फूला नहीं समा रहा था अपनी इस एकतरफा जीत पर!वो भई साहब एक दम शांत अब भी,उन्होंने अपना मोबाईल निकाला और फिर जो सुनाया वो आज आप के सामने है!
अपनी नासमझी भी समझ आ गयी थी!सुन कर मै स्तब्ध रह गया,फिल्म गुलाल तो मैंने नहीं देखी अभी तक पर ये गीत काफी कुछ सुना गया मुझे!आप भी महसूस करें....

ओ  री  दुनिया.…
ए  सुरमई  आँखें  के  प्यालो  कि  दुनिया  ओ  दुनिया,
सुरमई आँखें  के  प्यालो  कि  दुनिया   ओ   दुनिया
सतरंगी रंगों गुलालो कि दुनिया ओ दुनिया.
सतरंगी रंगों गुलालो की दुनिया ओ दुनिया


अलसाई  सेजो  के  फूलों  कि  दुनिया  ओ  दुनिया  रे,
अंगडाई तोड़े कबूतर की दुनिया ओ दुनिया रे
ए करवट ले सोयी हकीकत की दुनिया ओ दुनिया,
दीवानी होती तबियत की दुनिया ओ दुनिया,
ख्वाहिश में लिपटी ज़रुरत की दुनिया ओ दुनिया रे,
हेय्य्य इंसान के सपनो की नियत की दुनिया ओ दुनिया,


ओ री दुनिया आअ.… ओ री दुनिया-2
यह  दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है?-2 -3 !


ममता की बिखरी कहानी की दुनिया ओ दुनिया,
बहनों की सिसकी जवानी की दुनिया ओ दुनिया,


आदम के हवा से रिश्ते की दुनिया ओ duniya रे,
हेय्य्य शायर के फीके लफ्जों की दुनिया ओ दुनिया
ओ..…oooo….हो.ooo.…..हो.oo…ooooooooo…


ग़ालिब के मोमिन के ख्वाबो की दुनिया,
मजाजो के उन इन्क़लाबो की दुनिया-2
फैज़ फिरक साहिर ओ मखदूम 
मेरे की ज़ौक  की दागों  की दुनिया,


यह दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है?-२-३!


पलछिन में बातें चली जाती है है,
पलछिन में रातें चली जाती है है,
रह जाता है जो सवेरा वो ढूंढें,
जलता मकान में बसेरा वो ढूंढें,


जैसी बची है वैसी की वैसी बचा लो यह दुनिया,
अपना समझ के अपनों की जैसी उठा लो ये दुनिया,
छिटपुट सी बातों में जलने लगेगी संभालो ये दुनिया,
कट-पिट  के रातों में पलने लगेगी संभालो ये दुनिया,


ओ  री दुनिया.… ओ री दुनिया.…
वो कहें है की दुनिया यह इतनी नहीं है,
सितारों से आगे जहाँ और भी है,
ये हम ही नहीं है वहां और भी है,
हमारी हरेक बात होती वहीँ है,
हमें ऐतराज़ नहीं है कहीं भी,


वो आलिम हैं फ़ाज़िल हैं होंगे सही भी,
मगर फलसफा यह बिगड़ जाता है जो


वो कहते है.…
आलिम ये कहता वहां इश्वर है,
फ़ाज़िल ये कहता वहां अल्लाह है,
क़ाबिल ये कहता वहां इसा है,


मंजिल यह कहती तब इंसान से कि..
तुम्हारी है तुम ही संभालो ये दुनिया..
यह उजड़े हुए चन्द  बासी चरागों,तुम्हारे ये काले इरादों कि दुनिया,

ओह्ह री दुनिया ओ री दुनिया.…ओ   री दुनिया.


पियूष मिश्रा जी का नाम पहले तो नहीं सुना था पर अब काफी सम्मानित हो गया है,जब पता चला कि ये गीत उन्होंने ही लिखा भी है और गाया भी है!
दोनों ही गाने समय को परिभाषित करते दिखाई दे रहे है!यदि आपके पास थोडा सा समाया है तो शान्ति से 
गुरुदत्त जी की प्यास यहाँ है.... 
और 
 गुलाल का रंग यहाँ.... 
देखे और महसूस करने की कोशिश करें......  


जय हिंद,जय श्रीराम,
कुंवर जी,

शुक्रवार, 7 मई 2010

जी हाँ!कसाब के साथ मै भी राष्ट्रद्रोही हूँ!क्या आप मुझे माफ़ करेंगे,मेरे इस राष्ट्रद्रोह के लिए.....

आज जैसे ही मैंने अखबार पढने के लिए उठाया तो कसाब को फांसी की सजा बुलने की खबर को ही मुख्य पाया!बढ़िया भी लगा!दिल में एक ख़ुशी की लहर सी तो दौड़ी थी सच में!लेकिन तभी वो ख़ुशी थोड़ी सी बेइज्जती में तब्दील होकर मेरी देशभग्ति की भावना पर प्रशनचिंह बन कर खड़ी हो गयी!


हम या तो देशभग्त है या फिर देशद्रोही!तीसरा कोई विकल्प नहीं होना चाहिए मेरे हिसाब से!कसाब देशद्रोही,उसको सजा मिलने से जिसे भी स्थायी ख़ुशी हुई वो देशभक्त!अखबार में भी उन सभी सच्चे देशभक्तों की फोटो छापी थी जिन्होंने देश में जगह-जगह अपनी ख़ुशी पटाखे फोड़ कर,जुलुस निकाल कर या ऐसे-वैसे-जैसे कैसे भी प्रदर्शित की थी!इसने तो सीधे मेरे देशभक्त होने पर सवाल खड़ा कर दिया जी!


मैंने ना तो पटाखे फोड़े,नकिसी जलसे-जुलुस में हिस्सा लिया और नहीं कसाब या आतंकवाद के पुतले फूंके!मै निर्लज्ज अपने रोज के कामो में ही उलझा रहा!अब पराइवेट कम्पनी(फेक्टरी) में नौकरी कर रहा हूँ तो क्या मेरी भक्ति बस मालिक के प्रति रहनी चाहिए,अपने देश की बजाये?


अरे क्या मै एक दिहाड़ी भी नहीं छोड़ सकता देशभक्ति दिखाने के लिए!ये कैसी देशभक्ति भई?फिर उसे फांसी मिलने की ख़ुशी तो मै मना ही नहीं रहा,साथ में ऐसी-वैसी खबरे भी पढ़ रहा हूँ!एक खबर नीचे दी गयी है!आप भी पढ़े......




"मौत की सजा मिलने में लगेंगे कई साल!

नई दिल्ली। अजमल आमिर कसाब की मौत की सजा पर अमल में कई साल लग सकते हैं। मौत की सजा पाने वाले दोषियों की सूची में उसका नंबर तीसवां हो सकता है। विशेष अदालत से सजा मुकर्रर होने के बाद हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट और फिर राष्ट्रपति के समक्ष दया याचिका के मौके बाकी हैं। कसाब की मौत की सजा पर मुहर लगाने के लिए विशेष अदालत ने अपने फैसले को बांबे हाईकोर्ट भेज दिया है। अपराध दंड संहिता के अनुसार निचली अदालत मौत की सजा पर स्वीकृति के लिए अपने फैसले को हाईकोर्ट भेजती है।


कानूनविद व वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी के अनुसार कसाब की ओर से हाईकोर्ट में विशेष अदालत के फैसले को चुनौती दी जाएगी। हाईकोर्ट साक्ष्यों को परखने के बाद निचली अदालत के फैसले की सख्ती को कम भी कर सकती है। यदि हाईकोर्ट फैसले को जारी रखते हुए मौत की सजा को बरकरार रखती है तो कसाब सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाएगा। रोहतगी के अनुसार सर्वोच्च अदालत पिछले फैसलों, साक्ष्यों, तर्कों के आधार पर अंतिम फैसला जारी करेगी। यदि फैसले में मौत की सजा जारी रहती है तो कसाब की ओर से पुनर्विचार याचिका दाखिल की जा सकती है। पुनर्विचार याचिका के खारिज होने के बाद कानूनी आधार पर क्यूरेटिव याचिका भी दाखिल होती है। सर्वोच्च अदालत में क्यूरेटिव याचिका के खारिज होने के बाद कसाब के पास राष्ट्रपति से दया की मांग करने का अंतिम रास्ता बचता है। राष्ट्रपति के पास पहले से ही अफजल गुरू समेत 29 गुनहगारों की दया याचिका विचाराधीन है।"


अब मै सोच रहा हूँ कि जब तक उसका समय समीप आएगा तो पता चले कि उसने महात्मा गांधीजी,रविन्द्र जी और विवेकानंद जी का साहित्य पढना शुरू किया हुआ है,और वो रामायण,गीता जैसे ग्रन्थ भी पढना चाहता है तो?


सरकार को उसे समय देना ही पड़ेगा!उसकी साहित्यिक जरुरत को पूरा करने के लिए!फिर पता चलता है कि उसका ह्रदय-परिवर्तन हो गया!तो?
हमारी सरकार दरिया-दिली दिखाते हुए श्री कसाब जी को बा-इज्जत बरी करने पर विवश होगी!और अब पता चलता है कि ये महाराज वापस पाकिस्तान नहीं जाना चाहते!भारत के द्वारा की गयी सेवा से वो प्रसन्न हुए और वो यही रहने का मन बना रहे है!उन्होंने भारत सरकार से इसकी अपील भी कर दी!
भारत सरकार जरुरत से भी ज्यादा उदार होने का एक उदाहरण और देती है!वो कसाब जी को ना सिर्फ भारतवासियों की छाती पर रहने की अनुमति देती है बल्कि आगामी चुनाव में अपना प्रत्याशी भी घोषित कर देती है!
इसका चुनाव जितना तो निश्चित ही था,जनता भी तो भावुक है भई!बेचारा,अपना देश छोड़ कर हमारे यहाँ रह रहा है,इस बार तो इसे ही वोट दे देते है!
अब वो प्रधानमन्त्री पद का दावेदार.......!
अब! 


अब आप ही बताये!मै देश भक्त तो हुआ नहीं,देशद्रोही ही हो सकता हूँ!जी हाँ!कसाब के साथ मै भी राष्ट्रद्रोही हूँ!क्या आप मुझे माफ़ करेंगे,मेरे इस राष्ट्रद्रोह के लिए.....


जय हिंद,जय श्रीराम,
कुंवर जी,

गुरुवार, 6 मई 2010

और यूँ हमारी एक-आध धड़कन और बढ़ जाती है!

कई बार
जिंदगी बहुत
करीब से गुजर जाती है,
अनजाने में
हमें जिन्दा होने का
एहसास करा जाती है,
मौत
हमें एक बार फिर से
मारने में शरमाती है,
और यूँ हमारी एक-आध
धड़कन और बढ़ जाती है!


भावो और शब्दों
की लड़ाई
आँखों से झड़ जाती है,
समय की पेशानी पर
कुछ सलवटें और पड़ जाती है,
फिर
अतीत की उदासी
एक झटके से उघड़ जाती है,
और
बेजान पुतलिया 
फिर हल्की सी सिकुड़ जाती है,
और यूँ हमारी एक-आध

धड़कन और बढ़ जाती है!


जय हिंद,जय श्रीराम,
कुंवर जी,














बुधवार, 5 मई 2010

अरे उनको देखने के लिए मेरी बहन ही मिली है क्या आज,और भी तो बहुत सी लडकिया है बाज़ार में, (वयंग्य)




कितने बेशर्म है सब,
पागलो की तरह देखते ही जाते है,
कुछ तो कुटिल तरीके से मुस्कुरा भी रहे है,
जैसे जाहिल हो,
अरे उनको देखने के लिए 
मेरी बहन ही मिली है क्या आज,
और भी तो बहुत सी लडकिया है बाज़ार में,

और ये मै क्यूँ गलती महसूस कर रहा हूँ,
आज तो मै किसी और लड़की को भी नहीं देख रहा,
ना नजरो ही नजरो में बहुत कुछ करना चाह रहा हूँ,
रोज की तरह,
उफ़!मेरी आज मेरे बहन साथ है तो क्या,
मुझे वो सब गलत लग रहा है 
जो कल तक ठीक ही नहीं,
अधिकार लगता था लडको का?
ये आज से पहले क्यूँ नहीं आया मेरे विचार में.....

जय हिंद,जय श्रीराम,
कुंवर जी,

सोमवार, 3 मई 2010

ना तो लेखनी में समर्पण है,ना सही है कभी आह कोई,क्या लिख पाऊंगा मै,खुद के लिए,औरो के लिए!(एक विचार...., )

ना तो लेखनी में समर्पण है,ना सही है कभी आह कोई,
क्या लिख पाऊंगा मै,खुद के लिए,औरो के लिए!


बहा चला गया हर बार बहाव के साथ मै,
बह गया गया कभी भाव के साथ मै,
खींच-तान रही जारी सदा लगाव के साथ मै,
रहा लुटता हर बार चुनाव के साथ मै!

क्या उलझन ही जीवन है,या पकड़ ली है गलत राह कोई,
क्या कोई सही राह चुन पाउँगा मै,खुद के लिए,औरो के लिए!


ये हताशा,निराशा सब तन की है,मन की तो नहीं,
देखना मेरे स्वभाव और शब्दों में कहीं अनबन तो नहीं,
मेरे विचारों में कहीं,आत्मा का उत्पीडन तो नहीं,
मेरी मुस्कान किसी के लिए कोई चुभन तो नहीं,

ना समझ  है, ना लगन,ना योग्यता ही कोई,
क्या उदहारण बन पाउँगा मै,खुद के लिए,औरो के लिए!















जय हिंद,जय श्रीराम,
कुंवर जी,

लिखिए अपनी भाषा में

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