गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010

ज़िन्दगी है क्या बोलो ज़िन्दगी है क्या ?

आज आपके समक्ष एक गाना प्रस्तुत कर रहा हूँ!फिल्म का नाम है "सत्यकाम"!मुझे बहुत अच्छा लगता है ये गाना!किशोर कुमार,महेंदर कपूर और मुकेश का संगम बहुत ही मन-भावन होगा ये बताने की जरुरत मै महसूस नहीं कर रहा हूँ!सुनने के लिए u-tube का लिंक नीचे दे दिया गया है!तो पढ़िए और सुनिए....

ज़िन्दगी  है  क्या  बोलो  ज़िन्दगी  है  क्या ?
(ज़िन्दगी है क्या बोलो ज़िन्दगी है क्या)



ज़िन्दगी  है  लट्टू -2 चाहे  जहाँ  नचालो,
चाहे  इधर  घुमालो  भाड़े  का  जसे टट्टू, 
लट्टू;ज़िन्दगी  है  लट्टू,  
ज़िन्दगी  है  लड़की  लड़की,
ज़िन्दगी  है  लड़की -२,

लड़की  का  नाम  मत  लो,  
क्यूँ?
उसका  सलाम  मत  लो,  
क्यूँ?
लड़की  बढाए कडकी!


लट्टू  नहीं  लड़की  नहीं,
ज़िन्दगी  है  सच्चाई-२!
मिट्टी  की  मूरत  जब  सच  बोली  आदमी  तब  कहलाई!

आदमी  है  क्या  बोलो  आदमी  है  क्या?

आदमी  है  बंदर-2 रोटी  उठा  के  भागे,
कपडे  चुरा  के  भागे  कहलाये   वो  सिकंदर,
बंदर  आदमी  है  बंदर-२,
आदमी  है  चरखा -2 अरे  चू-चू  हमेशा  बोले,
भो  भो  हमेशा  डोले  रुकते  कभी  ना  देखा-२,
आदमी  है  चरखा-२,
बंदर  नहीं  चरखा  नहीं  आदमी  का  क्या  कहना,
प्यार  मोहबत  फितरत  उसकी  दोस्ती  मजहब  उसका!

दोस्ती  है  क्या  बोलो  दोस्ती  है  क्या?

दोस्ती  है  मोटर  मोटर  सुब  जिसमे  घुमते  है,
मस्ती  में  झुम्तें  जब  तक  के  हो  ना  पंक्चर,
दोस्ती  है  मोटर,
दोस्ती  भाई  लस्सी  हूऊन  हहा  हूं-२,
दोस्ती  है  भाई  लस्सी  पिलो  ज़रा  ना  छोड़ो,
भूले  से  भी  ना  तोड़ो  जादू  की  यह  रस्सी,


लस्सी  नहीं  है  रस्सी  नहीं  दोस्ती  दिल  की  धड़कन-२,
दुश्मनी  सहरा-सहरा  करे,
दोस्ती  गुलशन  गुलशन-2-3.....


 
http://www.youtube.com/watch?v=skaepcQg1vs
इसे यहाँ सुने...
कुंवर जी,

बुधवार, 24 फ़रवरी 2010

अब मै क्या बताऊँ...........(कविता)

किसी को ना बताऊँ तो कहाँ जाऊं मै!
भगवान् ने भी जो ना सुनी वो किसको सुनाऊँ मै!

जो हो गया सो तो हो लिया,
कुछ पा लिया कुछ कुछ खो दिया,
एक दुख़ और माला में पिरो लिया,
एक पल और आंसुओ से भिगो दिया;
जिन्दा होने का वहम भी हो तो मर जाऊं मै!
ओरो को तो बहला दू खुद को क्या समझाऊं मै!

काश के हँसना-रोना होता ही नहीं,
काश के यूँ सपने कोई संजोता ही नहीं,
काश के जो हो गया वो होता ही नहीं,
काश के ये 'काश' कभी खोता ही नहीं;
आंसू भी मेरे सूख चुके आँखों को कैसे अब रुलाऊँ मै!
पलकों के अन्दर जो है उसको कैसे वहां से हटाऊँ मै!

साथी बहुत है पर विश्वाश नहीं है,
जिसको पकड़ लूं वो एक आस नहीं है,
किसी को झुठलाने का ये प्रयास नहीं है,
और किसी के भी ऊपर ये कयास नहीं है;
कोई धोखा बचा ही नहीं जिसको अब खाऊं मै!
कोई काँधा जो मिल जाए तो शायद सर रख पाऊं मै!

कमी किसकी रही ये अब किसको सूझे,
कोई सवाल दिखे भी तो कोई बूझे,
किस्मत के अँधेरे में हम सायें को जूझे,
खुद ही जब साथ नहीं तो क्या संभालेंगे दूजे;
मौत जो आकर चली गयी अब उसको ही बुलाऊं मै!
                                           अँधेरे में जो जलाए थे वो हर दीप बुझाऊं मै!

कुंवर जी,

शनिवार, 20 फ़रवरी 2010

शादी से पहले बातचीत .......?

यह विषय आज के समय को देखते हुए बड़ा जरुरी-सा विषय बनता जा रहा है!हालांकि इसकी आवशयकता है भी या नहीं ये परिस्थितियों पर बहुत निर्भर करता है,मेरे हिसाब से तो!इसका एक कारण बताया जाता है कि लड़की ओर लड़के की आपस में जानकारी बढ़ेगी और वो एक दुसरे को और अच्छी  तरह जान पायेंगे!जिस से कि उनका आने वाला समय बेहतर होगा!

किन्तु कई बार इसका उल्टा हुआ है!उनकी आपस में एक दुसरे के बारे में जानकारी तो बढ़ जाती है,लेकिन एक रिश्ता जो बनने जा रहा था वो बन नहीं पाता!यहाँ तक कि शादी होने के बाद भी!क्योंकि वो जान जाते है एक दुसरे के बारे में,पहले ही!रोमांच सारा ख़त्म!

पहले क्या होता था,या गाँव-देहात में क्या होता है,लड़का-लड़की एक दुसरे से बात करना तो दूर,जानते भी नहीं,और शादी हो गयी जी!आधुनिक जगत को ये बात बहुत अखरती है!ऐसा कैसे हो गया,कैसे हो सकता है?पता नहीं वो एक दुसरे को समझ पायेंगे या नहीं?वो नहीं समझ पायेंगे तो सुखी कैसे रहेंगे?वगराह-वगराह!

वो ज्यादातर सुखी रहते है!
असल में सुखी रहने का रहस्य दुसरे को समझने में कम और खुद को समझने में अधिक छिपा है!ऐसा नहीं है के वो एक दुसरे को नहीं समझते,समझते है!लेकिन जब तक वो एक दुसरे को समझते है तब एक बहुत बड़ा कालखण्ड जीवन का बीत चुका होता है,जानने के रोमांच में!और जो आनंद मनुष्य दुसरे की जिन्दगी ने झाँक कर लेता है उसका शायद कोई विकल्प नहीं!वो आनंद ले रहे होते है 'किसी अपने' की जिंदगी में झाँकने का!जबकि यही काम यदि शादी से पहले किया जाए तो हम केवल 'किसी' लड़के या लड़की की जिंदगी में झाँक रहे होते है जो अभी तक हमारा कुछ नहीं है!भविष्य में हो सकता है,अभी कुछ नहीं है!सो एक एह्न्कार-सा मन में आ जाता है कि हम निष्पक्ष होकर किसी की जिंदगी में देखेंगे जो की हम कभी हो ही नहीं सकते!एह्न्कार में निर्णय ठीक ही हो इसकी सुनिश्चितता नहीं होती!

दूसरी और जब हम 'किसी अपने' की जिंदगी में झांकेंगे तो हमारे पास निष्पक्ष होने या रहने की मजबूरी नहीं होती!हम स्वाभाविक ही अपने का पक्ष ले सकते है!उसमे केवल अच्छा ही देखने की कोशिश करेंगे!कुछ बुरा यदि दिखाई दे भी जाए तो सोच लेते है की पहले रहा होगा,अब हम नहीं होने देंगे ऐसा!कमियाँ अब भी देखेंगे साथ ही उन्हें ख़त्म करने के उपाय भी!

जबकि शादी से पहले केवल कमियाँ ही दिख पाती है,उपाय तक जाने की कोशिश ही नहीं की जाती!करे भी क्यों?किसके लिए?"ये नहीं तो और सही" वाली खिड़की होती है अभी हमारे पास!वो भी खुली हुई!कोई चिंता ही नहीं!

हालांकि इसका कभी-कभी लाभ भी होता है दोनों को! पर मैंने अब तक ऐसा कम ही देखा है!वैसे जो अनुभव हमारा है वो केवल हमारा ही है!जरूरी नहीं जिन परिस्थितियों में 'क' जो करेगा वही उन्ही परिस्थितियों 'ख' के लिए भी सही रहेगा!
कुंवर जी,

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2010

अजीब दास्ताँ है ये.......(2 )(हास्य-वयंग्य)

सर्वप्रथम तो आप सब का मुझे झेलते रहने का आभार प्रकट करना चाहुंगा!जिन्होंने मुझे "टिप्पणी ब्रांड" उत्साहवर्धक टोनिक की दो बूँद दी है,उन्हें मै बताना चाहूँगा के उनका ये प्रयोग सौ फीसदी सफल रहा!हर एक बूँद मेरे लहू में मिल जो रासायनिक क्रिया कर रही है उस से आप ज्यादा दिन अनभिज्ञ  नहीं रह पायेंगे!
मुझ तुच्छ पर दृष्टि डालने के लिए एक बार फिर मै आभार व्यक्त करता हूँ,साथ में आशा करता हूँ कि ये स्नेहाशीष सदा मुझे मिलता रहेगा!


पिछली बार जब हमारी बात रुकी थी तो कुंवर जी घर जा रहे थे और घर पहुँचने से घबरा भी रहे थे,क्यों? ये आपने पढ़ ही लिया!

हम घबरा जरुर रहे थे लेकिन हमारा मानसिक सन्तुलन  अभी भी कायम था!हम भली-भाँती जानते थे क़ि घर खाली हाथ जाना खतरे से खाली नहीं है,सो सर्दियों के मौसम के हिसाब से और अपनी जेब के मिजाज से मेल खाती चीज ले ही ली हमने!आप उत्सुक दिखाई दे रहे है सो बताये देता हूँ!हमने लिए जी "बादाम.......गरीबो के"!अर्थार्त मूंगफली,वो भी पूरी आधा किलो!साथ में गच्चक भी!मानो तो सोने पे सुहागा!


घर में प्रवेश करते ही सपना स्मरण हो आया जो सच सा प्रतीत हो रहा था!एक बात और पता चली के खीर भी बनायी गयी थी विशेषरूप से हमारे लिए!मन की शंकाओं ने मष्तिष्क की सहयता से षड़यंत्र रचने आरम्भ कर दिए ,सपने में दिखी सम्भावित आपदा से बचने के लिए!जाते ही सबसे पहले नतमस्तक माता-पिताश्री के श्रीचरणों में!श्रीमती जी अन्दर कक्ष में ही खड़ी-खड़ी निहार रही है जी और हम नजरे चुराने की झूठी कोशिशो में लगे है!


थोड़ी देर बाद पिताश्री भी उठ कर बहार चले जाते है,हम वही बैठे है!माताश्री,श्रीमती जी की भावनाओ को समझने के प्रयास करती दिखाई देती है,उन्हें हमारे लिए पानी लाने के लिए कह देती है!स्वयं वह से जाने के लिए बहार कोई काम याद आने की कह कर उठने लगती है!उन्होंने सोचा होगा के अब तो बात कर लेने दू दोनों को!परन्तु हम थोड़े से भयभीत थे सपने से!मिलने की जो उमंग-तरंग मनमे हर बार होती थी वो इस बार नहीं थी,आपको तो इमानदारी से बता ही सकता हूँ!

उमंग कि जगह मन में कुछ और था,आप तो समझ ही गए होंगे!माताश्री बहार चली गयी हमे अकेले ही जूझने के लिए छोड़कर!थोड़ी देर तो मेहमानों वली आव-भगत सी हुई,फिर बात मुद्दे कि और मुड़ती प्रतीत हुई हमे!हमने तुरन्त मूंगफली और गच्चक रूपी कवच-कुण्डल का प्रयोग किया,सफल भी रहा!कुछ देर के लिए ही सही,पर तब तक हमे खुद को सम्भालने  का समय मिल गया था!जैसे कैसे हम खुद को वह से निकालने में सफल रहे!उसके बाद तो संजीव के यहाँ बांग्लादेश और कीनिया का क्रिकेट टेस्ट मैच देखने बैठ गए!वो भाई साहब तो बोर हो गए थोड़ी देर में ही,पर हमे तो वो भी एक बहुत अच्छा साधन दिखाई दे रहा था खुद को व्यस्त रखने का,सो हम तो देखे जा रहे थे!

हम कितना ही दिखावा कर ले खुद को अपनी परेशानियों से अलग रखने का पर ये जालिम मन,रह-रह कर वहीँ दौड़ जाता है!अपना भी कुछ ऐसा सा ही हाल था!संजीव ने तंग आ कर पूछा के "और कितने  बचे है?"
हम बोले-"आठ सौ ही बचे है यार!"खैर 2-3 बार चाय देने के बाद वो भी टलता सा जान पड़ा तो हम फिर घर की और हो लिए!

शाम भी हो चली थी,घर के सिवा कोई और ठौर भी नहीं थी!सो हम एक बार फिर घर में!और मन में अब भी वो ही ख़याल के तनख्वाह 6000 मिली हुयी है इस बार तो,घर वालो कुछ ज्यादा मिलेगा पहले से!पर हाथ में केवल 800 !इसीलिए टलते फिर रहे थे!

माता-पिताश्री थोड़े संतोषी है,जब हमने पैसो का कुछ जिक्र नहीं किया तो उन्होंने सोच लिया के पैसे बहू को भी देगा तो भी घर में ही रहेंगे!उन्होंने ज्यादा छान-बीन नहीं करनी चाही!

अब पत्नीश्री को कैसे समझाया जाए?अब एक समय तो ऐसा आ ही जाता है जब मुसीबात सीधे गले पड़ती ही है(मेरा मतलब कुछ और नहीं है)!वो समय भी आ ही गया!उन्होंने समय अधिक ना लेते हुए सीधे मुद्दे की बात छेड़ दी!कुछ था ही नहीं देने को,पर ये कह भी नहीं सकते थे!कम से कम उनकी नजरो में तो 'कुछ' छवि थी ही हमारी,हम उसे भी धूमिल जो नहीं करना चाह रहे थे!मगर नारी और चतुराई तो साथ-2 ही रहते है!और जब चतुराई अहंकार से घुल-मिल जाए तो वो कुछ भी सोच सकती है!

हमारे बार-बार टलने से  जो उन्होंने सोचा वो उनकी एक दबी-सी जलन का हिस्सा भी लग रहा था!वो बोली-"एक बार फिर हो गए घरवालो के,वो तो तुम्हे ऐसे ही लूटेंगे सारी उम्र!लुटते रहो,मुझे क्या?मै कोंन-सा अपने लिए मांग रही थी?तुम्हारे ही घर में खर्च होने थे!मगर कौन सुने मेरी!कोई कुछ समझे तो सुने भी!जिन्हें समझते थे उनको तो दे दिए सारे पैसे!अब जब जाओगे फिर फैलाना उनके आगे हाथ!देखती हूँ  मै भी के कब हमे भी कुछ समझा जाएगा!..........."

उसका बोलना जारी था पर मुझे थोड़ी राहत सी महसूस हो रही थी!कुटिल मुस्कान होंठो पर अपने-आप थिरक गयी,कसम से अपने-आप!मै जान-बुझ कर नहीं हंसा था!मैंने बस इतना ही कहा "पागल;वो भी तो तेरी तरह बस मेरी और ही देख रहे है....."

मेरे बोलने से ज्यादा मेरी हंसी ने अधिक हवा दे दी उसकी क्रोधाग्नि को!उसका बटन जैसे फिर दब गया हो,वो तो खैर पहले से ही दबा हुआ था!उसकी शिकायते-कम-आदेश निरंतर जारी थे!जब हमे लगा के बात सच में रूठने तक पहुंचने वाली है तो हमने एक बार फिर ब्रह्माश्त्र का प्रयोग किया!

और कुछ नहीं बस अगली बार सारी तनख्वाह उसके हाथ में ही रखने की बात कह दी,साथ में अंगूठी तो अगली बार ही,फर्श वो भी चिप्स वाला आने वाले दो-चार महीनो में,बिजली की फीटिंग गर्मियों से पहले,एक बड़ा लोहे का गेट भी बोल दिया के लगवा लेंगे,और जो पिछले तीन से साल से होता आ रहा था वही हुआ!बेचारी मेरी आँखों से सपने देख जरुर रही थी पर दिमाग अपना भी लगा रही थी!


फिर तो फर्श में डिजाइन कैसा होगा,गेट का डिजाइन क्या होना चाहिए.......... उसके सुझाव आ रहे थे जी शिकायतों की जगह!हमे लगा युध्ह-विराम के संकेत मिल गए है,सो शांति से सोने की तय्यारी करने लगे!सुबह चार बजे जो निकलना था दिल्ली के लिए!

हम सोच रहे थे क्या अजीब दास्ताँ है ये भी!माताश्री सोच रही है पैसे बहू को दे दिए होंगे,बहू सास से जली जा रही ये सोच कर कि पैसे उन्हें दिए गए है!जबकि सच कुछ और ही था!चलो जो भी था,वैसे भी जिंदगी भ्रमो के सहारे ही जीये जा रहे थे!एक-दो भ्रम और सही!....
कुंवर जी,

शनिवार, 13 फ़रवरी 2010

अजीब दास्ताँ है ये...(हास्य-वयंग्य)

राम राम जी!
जीवन भी कई बार अजीब परिस्थितियों से दो-चार करवा देता है!और हर किसी को!मुझे तो ऐसा ही लगता है!अब कुंवर जी को ही लो,फंस गए बेचारे ऐसी ही परिस्थिति में!मजे कि बात ये कि अपने ही घर में!


पौह का महीना हो तो बताने कि आवश्यकता नहीं कि ठंड अपने चरम पर होगी!कुंवर जी के घर में थोडा उत्सव का सा माहोल बनता दिखाई दे रहा था!रविवार था,बस यही तो बात ना होगी?अरे कुंवर जी आ रहे थे दिल्ली से,अब ये मत कहना के पिछले हफ्ते भी तो आये थे!यूँ तो हर रविवार को आ ही जाते है!पर इस बार कुछ तो ख़ास है?


घर में जाकर देखा तो आँगन गाय के ताजे गोबर से लीपा हुआ था!हर तरफ साफ़-सफाई सहज ही देखी जा सकती थी!हर कोई कुंवर जी के आने की बाट जोह रहे थे!कुंवर जी की माताश्री कह रही थी, "कितने दिनों के बाद आ रहा है मेरा बेटा,पता नहीं कितनी देर और लग जायेगी,उसने तो सुबह से कुछ खाया भी नहीं होगा?"
पिताश्री:-"आ जाएगा तेरा लाडला,विलायत से नहीं आ रहा है,ये दिल्ली रही!"


अन्दर कक्ष से जो आवाज आई उस से कहानी का रहस्य खुलता सा प्रतीत हुआ,सो हमने वही  कान लगाना उचित समझा!कुंवर जी की श्रीमती जी ने कही फोन मिलाया हुआ था,आने के तो कम ही अवसर होते है,सो मिलाया ही होगा!सम्भवतः कुंवर जी की साली से बात कर रही थी वें!कह रही थी, "करनाल में तो ढाई हज़ार ही मिलते थे उनको,दिल्ली में पूरे छः हज़ार!मैंने तो पूरे सत्रह व्रत किये थे उनकी इतनी तनख्वाह करवाने के लिए!पहले तो ये कह देते थे की 'इतने' में से क्या बचाऊं?अब तो ये भी ना कहने दूंगी तेरे जीजा जी को!आने दे एक बार उनको;देखती हूँ कितनी लाज रखते है वो मेरे व्रतो की!तीन हज़ार तो मै आते ही ले लूँगी,और सालगिरह भी आने वाली है, इस बार तो सोने की अंगूठी से कम 'गिफ्ट' नहीं चलेगा........"


और अचानक ब्रेक लगने से बस झटके से क्या रुकी,कुंवर जी जैसे कितने ही यात्रियों की नींद एक झटके में ही खुल गयी!हम तो हैरान-परेशान!ये कहाँ हम?श्रीमती जी कहाँ है?इधर-उधर देखा तो पाया कि अभी तो हम बस में ही है!वो सब तो एक सपना था!


असल में जागते हुए आदमी जिन चिंताओं में घिरा रहता है, सो कर भी उन्ही चिंताओं में उलझा रहता है!प्रमुखता के आधार पर चिंताए सपना बन कर सोने के बाद भी अपनी उपस्थिति दर्ज करवाती रहती है,कहीं ये हमे भूल ना जाए!अब कुंवर जी कि यही प्रमुखता रही होगी पिछले कई दिनों कि "कैसे पूंजी(तनख्वाह,या बची हुई तनख्वाह) का उचित वितरण किया जाए घर जाकर?"
घर वालो के,विशेषकर घरवाली कि योजनाओं का अनुमान तो हो गया था कुंवर जी को!
अब अपनी स्थिति का भी पूरा पता था हमे!
6000 रुपये वेतन है जरुर,मगर मिलता केवल 5200 रुपये ही है!बाकी कुछ हमारी वर्तमान कि सुरक्षा के नाम पर और कुछ भविष्य की सुरक्षा के नाम पर काट लिया जाता है,जाता कहा है ये तो पता नहीं,पर कटता जरुर है!

जहाँ हम रह रहे है वो दिल्ली है भाई,ससुराल नहीं जो मुफ्त में मलाई-कोफ्ता मिल जाता हो!अरे पानी भी खरीद कर पीना पड़ता है,रोटी,दाल-चावल की बात बहुत दूर रही!
और सबसे पहले "रहना"!चलने-फिरने के लिए तो बहुत जगह है,लेकिन जब थक जाये,तब?गाँव नहीं है जो किसी के भी यहाँ बैठ गए ओए कर लिया टाइम-पास!वो भी हो जाए तो रात को तो एक अपना ठिकाना चाहिए ही होता है!बहुत मिलते है दिल्ली में ठिकाने,पर उनका भी पैसा देना पड़ता है!सब मिला कर कम से कम 3000 रुपये तो तो इन्ही सब में चला गया!घर आने-जाने के में भी कम से कम एक हज़ार तो लग ही जाते है महीने भर में!अब इतनी ज्यादा पहली तनख्वाह थी ,तो दोस्तों के संग 'पार्टी' भी करनी पड़  गयी थी,8 -10 लोग एक साथ चाय पियेंगे तो खाली चाय थोड़े ही पिलाई जाती है,साथ में कुछ और हो ही जाता है!
और अब तक जो किसी से "लिया" हुआ था वो भी तो लौटाना था!
पिछली जेब से जब बटुआ निकाल कर देखा तो उसमे बचा-खुचा कर 800 रुपये मिले!

अब 6000 तनख्वाह वाले स्टेटस के लिए ही सही,अगली तनख्वाह तक जेब इतने पैसे तो होने ही चाहिए!......


सच्चाई तो ये थी हमारी,और घर....????

'सोचा घर पहुँच कर ही देखा जाएगा' और लगे देखने आकाश की और!
जैसे-जैसे बस आगे बढ़ी जा रही थी,घर आने का डर और अधिक सता रहा था!
आखिरकार घर आ ही गया!
.....
...
..
.


क्षमा चाहूँगा क़ि आगे क्या हुआ ये जानने के लिए आपको अगली पोस्ट का इन्तजार करना पड़ेगा.......
कुंवर जी,

बुधवार, 10 फ़रवरी 2010

डॉक्टर साहब(हास्य-वयंग्य)

बात उन दिनों की है जब कुंवर जी अपना 3 वर्षीय अभियांत्रिकी का उपाधि-पत्र  प्राप्त करने के पश्चात भी गाँव में ही समय व्यतीत कर रहे थे!कुछ दिन नौकरी भी कर ली थी,छूट गयी थी किन्ही कारणों से!तब तक स्नातक भी हो चुके थे 'अर्थशाश्त्र' जैसे विषय से!बावजूद इसके भी कुंवर जी घर पर ही समय व्यतीत कर रहे थे!बैठक में एक नीम का पेड़ पूरा दिन साथ निभाता था उन दिनों हमारा!ऐसे ही एक दोपहर हमने गौर की कि एक हमारा पुराना मित्र;जो विद्यालय में हमारे साथ ही पढता था,या यूँ कहिये कि साथ छुपा करते थे कक्षा से!तभी की मित्रता थी जो बस तब तक ही थी!

हाँ तो वो मित्र,हमने देखा के वो डॉक्टर बन गया है!हमारे अचरज का तो कोई ठौर-ठिकाना ही नहीं था! ये देख कर नहीं के वो डॉक्टर बन गया है,बल्कि ये देख कर कि वो अति-व्यस्त भी है!हर घंटे में उसके दो-तीन चक्कर लग जाते थे प्रतिदिन ही!मतलब धंधा खूब चल रहा था!कमाई भी खूब हो रही होगी!'एक वो' जिसने 10वी तो शायद कर ही ली थी जैसे-कैसे भी,वो आज गाँव का एक अति-व्यस्त डॉक्टर है और 'एक हम' जो इतनी उपाधिया प्राप्त करने के पश्चात भी गाँव में खाली बैठे है "बेरोजगार"!

                                               जब भी 'वो' अपनी साईकिल पर पता नहीं क्या गुनगुनाता हुआ हमारे सामने से गुजरता तो सांप से लोटते थे हमारी छाती पर!
                             और उस दिन तो हमसे रहा ही नहीं गया!जो खार मन में इक्कट्ठा होता जाता था इतने दिनों से, सोचा आज कुछ तो बहार निकाल ही दे!
अपनी पूरी अदाकारी झोंक दी हमने उस से बात करने में!
                                                                                                            शुक्र है के मन में जो बाते-भावनाए होती है,उनकी झलक बहार नहीं मिलती कैसे भी!ना ही उनमे से कोई विशेष प्रकार कि गंध फैलती है वातावरण में!जैसे अच्छी भावनाओं से सुगंध और बुरी से दुर्गन्ध!ऐसा होता तो किसी से बात करना ही असंभव हो जाता हमारा तो!पर शुक्र है कि ऐसा नहीं है!
     तो हमने उसे एक दिन रोक ही लिया!आँखों समस्त प्रेम उड़ेल दिया हमने,जितना हम उड़ेल सकते थे,समस्त!अब चमक तो स्वाभाविक ही आनी थी आँखों में!उसे तो ऐसा लगा होगा जैसे हमे तो इच्छित वर ही मिल गया हो उस से मिल कर!पुरानी स्मृतियों को बैसाखी बना कर बात-चीत करने के लिए खड़े हो गए हम तन कर!जितनी जलन मन में होती थी उसे देख कर,आँखों में उतना ही संतोष!

पूछने पर पता चला के बच्चे,बूढ़े,जवान,औरत और तो और जानवरों तक का इलाज वो सफलतापूर्वक कर लेता था!

अब बैसाखी कमजोर पड़ती दिखाई दी तो जो असल बात थी मन में वो निकाल ही दी उसी अदाकारी से!
                                                         
लघभग चापलूसी सी करते हुए पूछ ही लिया उसकी सफलता का राज!
अब जैसे उसकी तो दुखती हुई रग दब गयी हो जैसे!जो प्रसन्नता थी मुख-मंडल पर सब गायब!एक पुरानी दास्ताँ जो खुशियों से शुरू हुई थी,अब ग़मो कि और बढ़ चली थी!

पता लगा कुछ भी तो अलग नहीं था उसकी और हमारी स्थिति में!बस हमारे पास एक-दो उपाधियो के साथ का अनुभव था और उसके पास केवल 10वी के साथ का!

हालात एक थे,फिर ये वयस्तता कैसी?

चलती बात पर अपनी ये कुण्ठा भी हमने ख़त्म करनी चाही!अब थोडा आत्मविश्वाश भी आ रहा था हमारे अन्दर!अंततः ये भी पूछ ही लिया हमने!

अब जो जवाब आया,उसमे उस बन्दे की सारी दार्शनिकता उभर आई!

वो बोला,"कैसी वयस्तता भाई?कोई दवाई लेने मेरे पास आता ही नहीं,साईकिल पर डॉक्टर का झोला टाँगे इसलिए गाँव में घूमता रहता हूँ के कोई देख कर ही रोक ले कुछ दवाई लेने के लिए!पर कोई रोकता भी नहीं!"
बस !
अब तो जैसे मन के सारे ऋण चुकते हो गए हो!सारा अभिनय ख़त्म!सच्ची प्रसन्नता आँखों में झलक आई,एक विजयी मुस्कान होंठो पर थिरक गयी!मंतव्य पूर्ण हो चुका था अपना तो,पर उसका वाक्य जारी था!मगर अपने किस काम का!
                                                                                                     जो सुनना था सुन लिया था,संतुष्टि हो जाने पर सब व्यर्थ जान पड़ता है!सो कुछ और सुनाई ही नहीं दे रहा था!खुद के लिए जो अपमान मन में पनप रहा था कुछ कम हुआ!अब एक बात और सोची के जब वो ये जानते हुए भी कि उस से कोई दवाई नहीं लेता है फिर भी गाँव में घूमता है ये सोच कर कि आज तो कोई ले ही लेगा,तो मै क्यों अभी तक गाँव में ही पड़ा हूँ!जब करनी नौकरी ही है तो कही तलाश क्यों नहीं कि जाए?मिल भी जायेगी एक दिन!और आज मै कर रहा हूँ नौकरी!
कुंवर जी,

मंगलवार, 9 फ़रवरी 2010

मन की असमंजस (कविता) {हरयाणवी रागणी}

आज पता नहीं क्यूँ अपणी मातृभाषा की गोद में बैठने का मन हो रहा है!मै मूलतः हरयाणा का रहने वाला हूँ,हरयाणवी ही वो पहली भाषा है जो मेरी जुबान ने सर्वप्रथम बोली!सो मातृभाषा "हरयाणवी" को कह दू तो ज्यादा गलत न होगा!जैसे हिंदी में कविता,गीत और ग़ज़ल होती है वैसे ही हरयाणवी में 'रागणी' होती है!छंदों का खूबसूरत सा मिश्रण,एक लय और ताल पर जब इसे सुनते है तो कानो का उद्देश्य पूर्ण होता प्रतीत होता है!आप जो अभी पढने जा रहे हो वो एक तुच्छ सा उदाहरण है 'रागणी' का!अब मै तो तुच्छ ही लिख सकता हूँ असली कलाकारों के सामने!
पंडित लख्मीचंद, पंडित मांगे राम,पंडित जगदीश चन्द्र वत्स आदि बहुत बड़े-बड़े नाम है इस श्रृंखला में जिनकी रचनाये वास्तव में महान है!उनको पढ़ कर-सुन कर मेरे चंचल मन में भी कुछ चिड़ियाए फुदक उठती है कभी-कभी!उसी का एक नतीजा आज आप के समक्ष है!

नुक्सान ठा  रहया सूँ मै तेरे तै ना कहवण का!
फेर बेरया ना यो बखत रहवण का ना रहवण का!

बोल कै बता दिया तो ख़तम कहाणी हो ज्यागी,
इब तो तू अपणी सै फेर  चीज बीराणी हो ज्यागी, 
तू बी अणजाणी  हो ज्यागी ढूंढेगी बहाना जावण का!

मन्ने जो कहया नहीं के वो कहणा जरुरी सै,
तू भी तो कह नहीं सकती तेरी अपणी मज़बूरी सै,
जो बात अधूरी सै,करू पूरी जो टाला करू शरमावण का!

जो नहीं कहया तो फेर भी के चाला हो सै,
जिसकी न कोई गौर करै उसका भी राम-रुखाला हो सै,
यु जखम कुधाला हो सै नहीं होता दिखावण का!

मीन तडपे ज्यू पाणी तै बहार आणे पै,
चकवा तरसै ज्यू बादलो के बिन बरसे जाणे पै,
न्योए तेरे तै ना कह पाणे पै हाल मेरा नहीं बतावण का!

कोई के सम्झेग्या जो मेरे जी पै बण रहयी,
कुछ हरदीप माड़ा कुछ किस्मत माड़ी बण रहयी,
बात रह गयी अणकही और हौसला भी नहीं समझावण का!
कुंवर जी,

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2010

जारी है संघर्ष मेरा मुझको "मैं" बताने का...(कविता)

सितम्बर-06 ,तिथि सम्भवतः 29   या 30 ! दिन के १२ बजे के लघभग का समय!कुंवर जी कक्ष में शान्त,अकेले ओर गहन चिन्तन में!अधिकतर ऐसी स्थिति बहुत कम ही आती है जिनमे कुंवर जी इन तीनो के संग दिखाई दे!बात ही ऐसी हो गयी थी थोड़ी देर पहले!एक लम्बे अन्तराल के पश्चात जुलाई में जो नौकरी मिली थी वो छूट गयी थी,दूसरी का कोई इन्तजाम उस समय तो था नहीं!घर वालो को भी इस बात का अभी पता नहीं!
पता नहीं क्या हो रहा है,क्या होने जा रहा है?
इसी उधेड़-बुन में, जो कुंवर जी अक्सर करते है, आज फिर करने वाले थे! कलम और कागज़ के मिलन भर कि देर थी बस! और जो किया या हुआ वो आज आपके समक्ष है......

जारी है संघर्ष मेरा मुझको "मैं" बताने का,

बस में नहीं हैं कुछ मेरे इस बात को झुठलाने का!


हाड-मांस का भरा पूरा शारीर हूँ मैं,
मजबूरिओं और नाकामियो की तहरीर हूँ मैं,
बावजूद इसके बिना फूल चढी तस्वीर हूँ मैं,
जो बस अब खुलने वाली हैं वो ही तकदीर हूँ मैं,
अब भी कोई तर्क बचा हैं मुझे खुद को छुपाने का;


टूटा तारा तो नहीं हूँ इतना तो मुझे पता हैं,
बस कही पहुँच नहीं पता हूँ ये ही मेरी खता हैं,
कर सकता हूँ पर करता नहीं हूँ एक ये विपत्ता हैं,
उसे तो उठना ही पड़ता हैं जो एक बार कही गिरता हैं,
इसीलिए ढूंढ़ रहा हूँ मैं बहाना एक बार कहीं गिर जाने का;


मुझ पर हंसती हैं ये दुनिया तो हंसती रहे,
मुझे क्या हैं अपने वहम में लाख फसती रहे,
मै अभी हारा नहीं हूँ चाहे नाकामी मुझे यूं ही डसती रहे,
बनूँगा वो मशाल जो अनंत तक अथक जलती रहे,
बची राख सुनाएगी किस्सा मेरे इस तरह जल जाने का!


जारी है संघर्ष मेरा मुझको "मैं" बताने का,
बस में नहीं हैं कुछ मेरे इस बात को झुठलाने का!

ये वो कविता भी है जिसे पढ़ कर मै कभी-भी उस समय में छलांग लगा जाता हूँ जिसमे मै असल में कुछ भी तो नहीं था!हूँ तो अब भी नहीं,पर थोडा सा परिवर्तन आ गया है तब में और अब में!
इसी कविता ने मुझे एक पहचान दिलाने में अहम् भूमिका भी निभाई है!एक ऐसे वयक्तित्व कि नजरो में जिनको  एक 'आदर्श मार्गदर्शक' कहे तो अधिक समीप होंगे हम उनका परिचय पाने के!
मुझे नहीं पता था कि  मै क्या लिखे जा रहा हूँ,बस जो लिखा गया सो लिखा गया!या यूँ कहिये कि जैसा मुझे लग रहा था वैसा मै लिखे जा रहा था!और जो लिखा गया वो आप पढ़ ही चुके है!
कुंवर जी,

सोमवार, 1 फ़रवरी 2010

दुःख...(वयंग्य)

मित्र!एक ऐसा शब्द है जो पूर्णता देता है हमे!या यूं कहिये कि सम्पूर्णता देता है हमे,यदि 'मित्र' शब्दों से बहार है तो!मै आज थोडा सा गंभीर सा हो गया हूँ,अपने एक मित्र को  धोखा देते हूए देख कर!

अभी एक फिल्म देखी थी '३ idiots'!उसमे अभिनेता दिल को धोखा देने कि बात कहता है जो हमे अच्छी लगती है!
                                                                             मुसीबत में है जी और मन को समझा दो के कुछ है ही नहीं!लेकिन ये फिल्मो में ही ज्यादा अच्छा लगता है,असल जिंदगी में थोडा मुश्किल है!
                                                                 
                                                             असल जिंदगी में धोखे देने भी मुश्किल होते है और धोखे खाने भी!मै सोचता हूँ के धोखा खाने वाला इतना मजबूत नहीं होता होगा जितना के धोखा देने वाला होता होगा!पहले कितनी योजना बनानी पड़ती होगी,लाभ-हानि का भी पहले ही हिसाब लगाना पड़ता होगा,अपनी साख बचाने के इंतजामात भी पहले ही सुनिश्चित करने पड़ते होंगे! 'ये ही' हुआ तो क्या करना है?'ये नहीं' हुआ तो क्या करना है?कोई ओर बात हो गयी तो.......!बहुत सारी योजनाए बनानी ओर उन पर पूरी एकाग्रता से काम भी करना,कोई चूक नहो जाए!हो भी गयी तो उस-से भी निपटाना!बहुत मेहनत है इसमें!मानसिक ओर शारीरिक रूप से मजबूत वयक्ति ही(औरत भी) इस पूरे घटनाक्रम को क्रियान्वित कर सकता है!
देखा कितनी मेहनत,लगन ओर निष्ठा का काम है धोखा देना,धोखा खाने में क्या है?
                             जैसे क्रिकेट में एक तेज गेंदबाज बहुत दूर से दौड़ कर आता है,अपना पूरा जोर लगा देता है वो गेंद को फेंकने में,ओर बल्लेबाज अपना बल्ला उठा कर उस गेंद को जाने दे! तो क्या बीतती होगी उस गेंदबाज पर,ये एक सवेंदनशील कविता का विषय बनने के योग्य मुझे तो लगता है!
ठीक ऐसे ही एक परिश्रमी साथी अपने अथक प्रयासों से आपको धोखा दे और आप एक ही झटके में उसकी मेहनत पर पानी फेर दो ये कह कर के "मेरी तो किस्मत मे ही ये लिखा होगा,चलो एक शुरुआत ओर सही!"
मतलब कोई मुकाबले की बात नहीं,प्रतिशोध की बात नहीं,एक दम से हार मान कर दिखा दी अपनी अक्षमता!
देखा, धोखा देना हुआ न मुश्किल,धोखा खाने के मुकाबले!कुछ भी तो नहीं करना पड़ता धोखा खाने के लिए!न पहले धोखा खाने की तय्यारी, न बाद में धोखे से बचने के प्रयास! 

मै भी अपने एक मित्र का जिक्र कर रहा था जो आजकल धोखा देने में  महारत हासिल करता जा रहा है!उसे देख कर ही आज पूरा दिन मै गंभीर सा रहा,जो की मै अमूमन हुआ नहीं करता!मतलब उसका "धोखा" दिल को लग गया बस समझो!
जो बहुत सारे समय मेरे साथ रहे,मेरे साथ हँसे,सभी के साथ ऐसे वयवहार करे जैसे वो सीधा सा-सच्चा सा है ओर वो इतना बड़ा धोखा देता हुआ दिखे तो बात दिल तक तो पहूँचती ही है!

                                                                 उसके वयक्तिगत जीवन में एक बहुत बड़ा घटनाक्रम अचानक गुजर गया,जो किसी भी लोह पुरुष को बड़े आराम से तोड़ दे, ऐसा घटनाक्रम!और उन जनाब पर कोई असर उसका दिखाई ही नहीं दिया!ओर जो बताया वो ये था..."जब रोना आता है तो कागज़ पर दो आँखे बनायी ओर टपका दिए दो आंसू उन से.दिल हल्का हो जाता है!"
वाह! क्या खूब धोखा दिया जा रहा है दुःख को भी! 
दुख़ बेचारा इतनी मेहनत कर के आया होगा के इतने से तो रुला ही दूंगा,और कागज़ पर ही आंसू छाप कर दिखा दिया ठेंगा दुःख को भी!
बस अब और मै कुछ भी लिख नहीं पाऊंगा!क्योंकि मै अभी धोखा देने में अक्षम हि हू!ये कला नहीं आई अभी मुझे......
कुंवर जी,

लिखिए अपनी भाषा में

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